NDB का बड़ा ऐलान: 2026 तक 30% कर्ज स्थानीय मुद्रा में देगी बैंक, भारत के लिए क्या हैं मायने?

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AuthorMehul Desai|Published at:
NDB का बड़ा ऐलान: 2026 तक 30% कर्ज स्थानीय मुद्रा में देगी बैंक, भारत के लिए क्या हैं मायने?

New Development Bank (NDB) ने अपनी स्ट्रेटजी में बड़ा बदलाव किया है। बैंक का लक्ष्य है कि साल **2026** के अंत तक उसके कुल पोर्टफोलियो का **30%** हिस्सा स्थानीय मुद्राओं (Local Currencies) में हो। इसका मकसद उभरती अर्थव्यवस्थाओं को विदेशी मुद्रा की अस्थिरता से बचाना है। भारत के लिए, बैंक रुपी-डिनोमिनेटेड बॉन्ड प्रोग्राम पर काम कर रहा है, जिसमें PFRDA ने पेंशन फंड्स को निवेश की मंजूरी भी दे दी है।

BRICS देशों द्वारा स्थापित New Development Bank (NDB) अब अपने इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को फंड करने के तरीके को पूरी तरह से बदल रहा है। बैंक का नया लक्ष्य है कि साल 2026 तक उसके कुल लेंडिंग का 30% हिस्सा भारतीय रुपया, चीनी रेनमिनबी या दक्षिण अफ्रीकी रैंड जैसी स्थानीय मुद्राओं में हो। अब तक बैंक का पूरा कामकाज काफी हद तक अमेरिकी डॉलर पर निर्भर रहा है, लेकिन अब यह एक बड़ा रणनीतिक बदलाव है।

डॉलर की निर्भरता कम करने का कारण

इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण मेंबर देशों को विदेशी मुद्रा की अनिश्चितता से बचाना है। जब विकासशील देश अमेरिकी डॉलर जैसी विदेशी मुद्रा में कर्ज लेते हैं, तो अपनी मुद्रा कमजोर होने पर उनके लिए कर्ज चुकाना बहुत महंगा हो जाता है। स्थानीय मुद्राओं में लोन देकर, NDB इन देशों को ग्लोबल करेंसी फ्लक्चुएशन के खतरे से दूर रखना चाहता है।

भारत के लिए क्या है खास?

भारत के लिए यह पहल काफी मायने रखती है। NDB भारतीय रुपये में बॉन्ड जारी करने का प्रोग्राम तैयार कर रहा है। इससे घरेलू कैपिटल मार्केट को मजबूती मिलेगी और निवेशकों को निवेश का एक और बेहतरीन विकल्प मिलेगा। राहत की बात यह है कि Pension Fund Regulatory and Development Authority (PFRDA) ने पहले ही भारतीय पेंशन फंड्स को NDB के रुपी बॉन्ड्स में पैसा लगाने की अनुमति दे दी है, जिससे देश की बचत अब सीधे विकास कार्यों में इस्तेमाल हो सकेगी।

चुनौतियां भी हैं सामने

अमेरिकी डॉलर को पूरी तरह किनारे करना आसान नहीं है। डॉलर दुनिया की सबसे 'लिक्विड' करेंसी है, यानी इसमें ट्रेड करना बहुत आसान है। वहीं, स्थानीय मुद्राओं में उतनी लिक्विडिटी नहीं होती। साथ ही, NDB को इंटरनेशनल क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के मानकों का भी ध्यान रखना होगा, जो आमतौर पर डॉलर-डिनोमिनेटेड एसेट्स को तरजीह देती हैं। बैंक को अपनी क्रेडिट रेटिंग और अपने लक्ष्य के बीच एक सही तालमेल बिठाना होगा।

अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि NDB कितने बड़े पैमाने पर ये रुपी बॉन्ड्स जारी करता है और क्या वह तय समय सीमा के भीतर 30% के टारगेट को हासिल कर पाता है या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.