Essel Group के चेयरमैन Subhash Chandra की पर्सनल इनसॉल्वेंसी सेटलमेंट को लेकर NCLAT में सुनवाई की तारीख तय हो गई है। मामला ₹22,006 करोड़ के बड़े क्लेम और सिर्फ ₹6.5 करोड़ के ऑफर के बीच फंसा हुआ है।
NCLAT ने Essel Group के चेयरमैन Subhash Chandra से जुड़ी पर्सनल इनसॉल्वेंसी सेटलमेंट पर कानूनी लड़ाई के लिए 29 और 30 अक्टूबर की तारीख तय की है। इस विवाद का मुख्य कारण ₹22,006.57 करोड़ के कुल पर्सनल गारंटी क्लेम और महज ₹6.5 करोड़ के प्रस्तावित सेटलमेंट अमाउंट के बीच का भारी अंतर है। ट्रिब्यूनल ने बैंक लेनदारों को एक हफ्ते के भीतर अपनी प्रतिक्रिया दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसके बाद सुभाष चंद्रा को अपना जवाब देना होगा।
पर्सनल गारंटी पर विवाद
पर्सनल गारंटी वह कॉन्ट्रैक्ट है जहां प्रमोटर कंपनी की विफलता पर कर्ज चुकाने का वादा करते हैं। मौजूदा केस में LIC Housing Finance, Canara Bank और Union Bank ने सेटलमेंट प्लान को चुनौती दी है। लीगल प्रक्रिया का एक बड़ा हिस्सा अब 5 सदस्यीय NCLT बेंच के गठन पर सवाल उठा रहा है, जिसने पहले सेटलमेंट के पक्ष में आए फैसले पर रोक लगा दी थी।
CBI जांच का पेच
मामला तब और जटिल हो गया जब Central Bureau of Investigation (CBI) ने जांच शुरू की। आरोप है कि कर्ज हासिल करने के लिए सुभाष चंद्रा ने अपनी नेट वर्थ को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया था। LIC Housing Finance की शिकायत के मुताबिक, ₹980 करोड़ के लोन लेने के लिए फर्जी सर्टिफिकेट्स का इस्तेमाल हुआ, जिससे बैंक को अनुमानित ₹1,322 करोड़ का नुकसान हुआ है। NCLT ने इस जांच को नोटिस में शामिल किया है, क्योंकि इसका नतीजा इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया की वैधता पर सीधा असर डाल सकता है।
बैंकों और निवेशकों के लिए क्यों है अहम?
यह केस बैंकिंग सेक्टर के लिए एक बड़ा सबक साबित हो सकता है कि प्रमोटरों से पर्सनल गारंटी के जरिए पैसे वसूलना कितना चुनौतीपूर्ण है। अगर कोर्ट इतने बड़े अंतर वाले सेटलमेंट को मंजूरी देती है, तो भविष्य में कर्ज वसूली के लिए यह एक मिसाल बन सकता है। बाजार की नजरें अब अक्टूबर की सुनवाई पर टिकी हैं कि क्या बेंच के गठन और CBI जांच को लेकर कोई स्पष्टता आती है या नहीं।
