भारत की प्रमुख नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियां (NBFCs) अब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) से रिवॉल्विंग क्रेडिट प्रोडक्ट्स पर प्रस्तावित बैन को वापस लेने की अपील कर रही हैं। इंडस्ट्री के बड़े खिलाड़ियों का कहना है कि इस फैसले से **₹2 लाख करोड़** से ज़्यादा के क्रेडिट पर असर पड़ सकता है और यह छोटे और मध्यम उद्योगों (MSMEs) के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकता है।
RBI के ड्राफ्ट में क्या है?
RBI ने 6 अगस्त, 2026 को 'NBFC क्रेडिट फैसिलिटीज डायरेक्शन्स' में कुछ ड्राफ्ट अमेंडमेंट्स जारी किए हैं। इसके तहत NBFCs के लोन स्ट्रक्चर करने के तरीकों में बड़ा बदलाव करने का प्रस्ताव है। ड्राफ्ट में रिवॉल्विंग क्रेडिट फैसिलिटीज पर रोक लगाने की बात कही गई है। इसका मतलब है कि NBFCs को फिक्स्ड अमाउंट वाले टर्म लोंस की तरफ बढ़ना होगा, जिनका पेमेंट शेड्यूल भी पहले से तय होगा। इस प्रस्तावित बदलाव से इंडस्ट्री के बड़े नाम जैसे Bajaj Finance, Tata Capital और Shriram Finance चिंतित हैं। इन कंपनियों ने 14 अगस्त, 2026 को फाइनेंस इंडस्ट्री डेवलपमेंट काउंसिल के ज़रिए एक साथ मिलकर जवाब देने की रणनीति बनाई है।
इंडस्ट्री के लिए क्यों है चिंता की बात?
इंडस्ट्री की मुख्य चिंता यह है कि इससे उनके मौजूदा बिजनेस मॉडल पर बुरा असर पड़ सकता है। रिवॉल्विंग क्रेडिट प्रोडक्ट्स, जैसे कि डिजिटल क्रेडिट लाइन्स और फ्लेक्सी-लोन्स, उधारकर्ताओं को एक तय लिमिट के अंदर पैसे निकालने और वापस चुकाने की सुविधा देते हैं। ये फ्लेक्सिबिलिटी सामान्य टर्म लोंस में नहीं मिलती। NBFCs का अनुमान है कि इस बदलाव से ₹2 लाख करोड़ से ज़्यादा की एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) पर असर पड़ेगा। ये प्रोडक्ट्स माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) और इंडिविजुअल उधारकर्ताओं के बीच काफी पॉपुलर हैं, जो इन्हें शॉर्ट-टर्म लिक्विडिटी और वर्किंग कैपिटल के लिए इस्तेमाल करते हैं।
ऑपरेशनल और कॉम्पिटिटिव चुनौतियां
ऑपरेशनल लेवल पर भी इस बदलाव को लागू करने में कई दिक्कतें हैं। लेंडर्स का कहना है कि रिवॉल्विंग फैसिलिटीज को टर्म लोंस से बदलने के लिए बार-बार क्रेडिट अप्रेजल, ढेर सारे डॉक्यूमेंटेशन और जटिल डिस्बर्समेंट प्रोसेस की ज़रूरत पड़ेगी। इससे ऑपरेशनल कॉस्ट बढ़ सकती है, जो आखिर में उधारकर्ताओं पर ज़्यादा ब्याज दर या प्रोसेसिंग फीस के रूप में पड़ सकती है। इसके अलावा, इंडस्ट्री के एग्जीक्यूटिव्स को यह भी डर है कि इस बैन से NBFCs, बैंक्स की तुलना में कॉम्पिटिटिव नुकसान में आ जाएंगी, क्योंकि बैंक्स इसी तरह के वर्किंग-कैपिटल प्रोडक्ट्स ऑफर कर सकती हैं। उनका मानना है कि यह स्थिति लेंडिंग सेक्टर में बराबरी का मैदान बनाने के लक्ष्य को प्रभावित करती है।
मार्केट रिएक्शन और भविष्य की राह
6 अगस्त, 2026 को ड्राफ्ट गाइडलाइंस जारी होने के बाद, NBFC स्टॉक्स पर मार्केट सेंटीमेंट नेगेटिव हुआ। कई बड़े लेंडर्स के शेयर 5% तक गिरे, क्योंकि इन्वेस्टर्स भविष्य की ग्रोथ पर इसके असर का आकलन कर रहे थे। यह सेगमेंट सालाना 15% से 20% की दर से बढ़ रहा है, और स्टेकहोल्डर्स को डर है कि नए नियम इस ग्रोथ को धीमा कर सकते हैं। हालांकि RBI के सुपरवाइजरी डिपार्टमेंट ने पहले भी इन प्रोडक्ट्स पर चिंता जताई थी, NBFCs का कहना है कि वे पहले ही ज़रूरी बदलाव कर चुके हैं और इसे पूरी तरह बैन करना सही समाधान नहीं है।
RBI ने 28 अगस्त, 2026 तक इस ड्राफ्ट पर पब्लिक से फीडबैक मांगा है। इंडस्ट्री रेगुलेटर्स के साथ सीधी बातचीत की मांग कर रही है ताकि पूरी तरह बैन करने के बजाय टारगेटेड सुपरविजन जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सके। इन्वेस्टर्स के लिए, अगली बड़ी अपडेट इन गाइडलाइंस के फाइनल होने पर होगी, क्योंकि इसका असर NBFCs के प्रोडक्ट ऑफरिंग्स और आने वाली तिमाहियों में उनकी प्रॉफिटेबिलिटी और क्रेडिट ग्रोथ पर पड़ेगा।
