फेस्टिव सीजन में NBFCs रिटेल ग्राहकों को लुभाने के लिए आक्रामक हो गई हैं। वे प्रोसेसिंग फीस में छूट और कम ब्याज दरों के ऑफर दे रही हैं, लेकिन बढ़ते फंड कॉस्ट और बैंकों से कड़ी चुनौती के बीच निवेशकों को इनके मुनाफे पर नजर रखने की सलाह दी जा रही है।
भारत में रिटेल लेंडिंग का बाजार इस वक्त पूरी तरह गर्म है। फेस्टिवल सीजन का फायदा उठाने के लिए NBFCs ने अपने मार्केटिंग कैंपेन तेज कर दिए हैं। लोन लेने वालों को लुभाने के लिए ये कंपनियां न केवल प्रोसेसिंग फीस माफ कर रही हैं, बल्कि ब्याज दरों में भी कटौती कर रही हैं। डेटा के मुताबिक, पर्सनल लोन के क्षेत्र में NBFCs की हिस्सेदारी अब लगभग 46% तक पहुंच गई है, जो रिटेल क्रेडिट ग्रोथ में उनकी बड़ी भूमिका को दर्शाता है।
बड़े खिलाड़ियों का दांव
Poonawalla Fincorp, Bajaj Finance और HDB Financial Services जैसी प्रमुख कंपनियां दिवाली के मौके पर 9.99% से शुरू होने वाले लोन और आकर्षक रिवार्ड्स (जैसे गोल्ड कॉइन) ऑफर कर रही हैं। सिर्फ NBFCs ही नहीं, बल्कि Axis Bank और Punjab National Bank जैसे सरकारी और प्राइवेट बैंक भी अपने मार्केट शेयर को बचाने के लिए कोलैटरल-फ्री लोन और फीस माफी जैसे ऑफर्स के साथ मुकाबले में डटे हुए हैं।
मुनाफे पर दबाव का खतरा
निवेशकों के लिए यह स्थिति एक दोधारी तलवार जैसी है। एक तरफ लोन बांटने से रेवेन्यू बढ़ सकता है, वहीं दूसरी तरफ बढ़ते फंड कॉस्ट ने कंपनी के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर दबाव डाल दिया है। जब कंपनियां ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए ब्याज दरों में कटौती करती हैं, तो उनकी कमाई का मार्जिन कम होने का डर बना रहता है।
रिस्क मैनेजमेंट और आगे की राह
कंपनियां अपने पोर्टफोलियो को रीबैलेंस कर रही हैं और जोखिम भरे पर्सनल लोन से दूरी बनाकर एसेट क्वालिटी को बचाने की कोशिश कर रही हैं। आने वाले समय में निवेशकों को केवल लोन वॉल्यूम ही नहीं, बल्कि कंपनियों के तिमाही नतीजों में नेट इंटरेस्ट मार्जिन, फंड की लागत और बैड लोन यानी डेलिंक्वेंसी के आंकड़ों पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए।
