NBFCs अब अपने बढ़ते रिटेल लोन पोर्टफोलियो को Asset Reconstruction Companies (ARCs) को बेच रही हैं। रिटेल सेक्टर में बढ़ते दबाव और कॉर्पोरेट कर्ज के मौकों की कमी के कारण यह बदलाव जरूरी हो गया है, जिससे ARCs को अब छोटी-छोटी रिकवरी पर काम करना पड़ रहा है।
बढ़ते एनपीए (NPAs) और रिटेल लोन में आ रही दिक्कतों को देखते हुए NBFCs ने अपना रास्ता बदल लिया है। अब वे अपने पोर्टफोलियो को तेजी से ARCs को ट्रांसफर कर रही हैं ताकि बैलेंस शीट को क्लीन रखा जा सके और कैपिटल को रिसाइकिल किया जा सके। फाइनेंशियल ईयर 2026 में ARCs ने लगभग ₹2 लाख करोड़ का कुल स्ट्रेस्ड कर्ज खरीदा, जिसमें से रिटेल एसेट्स का हिस्सा ₹50,000 करोड़ रहा, जो सालाना आधार पर काफी ज्यादा है।
कॉर्पोरेट डील की कमी बनी वजह
पहले ARCs का पूरा ध्यान बड़े कॉर्पोरेट डिफॉल्ट्स पर होता था, लेकिन अब वहां मौके कम हो गए हैं क्योंकि National Asset Reconstruction Company Limited (NARCL) ने बड़े कॉर्पोरेट स्पेस को काफी हद तक कवर कर लिया है। ऐसे में प्राइवेट ARCs अब NBFCs के रिटेल लोन पूल को खरीदने में जुट गए हैं। NBFCs के लिए भी यह एक स्मार्ट मूव है क्योंकि यह इन-हाउस रिकवरी के लंबे इंतजार से कहीं ज्यादा तेज है।
ARCs के सामने ऑपरेशनल चुनौतियां
कॉर्पोरेट लोन में एक बड़ा अमाउंट हैंडल करना आसान होता है, लेकिन रिटेल लोन के मामले में कहानी बिल्कुल अलग है। इसमें हजारों छोटे-छोटे खाते होते हैं, जिन्हें मैनेज करने के लिए ARCs को नई टेक्नोलॉजी, लीगल सपोर्ट और लोकल फील्ड टीम्स पर भारी निवेश करना पड़ रहा है। यह हाई-वॉल्यूम का काम है और आने वाले समय में रिटेल लोन की डोमिनेंस जारी रहने की पूरी उम्मीद है।
रिस्क और बाजार की स्थिति
भले ही NBFCs के लिए यह बैलेंस शीट साफ करने का तरीका हो, लेकिन यह रिटेल सेक्टर में बढ़ते क्रेडिट प्रेशर की ओर भी इशारा करता है। निवेशकों को यह देखना चाहिए कि क्या रिटेल लोन की क्वालिटी में सुधार आता है या कर्ज का बोझ और बढ़ेगा। साथ ही, ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव और आर्थिक अनिश्चितता रिकवरी की टाइमलाइन को प्रभावित कर सकती है। अब सवाल यह है कि क्या ARCs इन छोटे-छोटे लोन की रिकवरी से अपना प्रॉफिट मार्जिन मेंटेन कर पाएंगी, क्योंकि इन्हें मैनेज करने की लागत काफी ज्यादा है।
