बॉन्ड मार्केट में दिखा बड़ा उलटफेर: NBFCs ने बढ़ाई उधारी, Corporates ने कसी कमर
March 2026 के आंकड़े भारत के शॉर्ट-टर्म डेट मार्केट में एक बड़े उलटफेर की ओर इशारा करते हैं। जहां नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां (NBFCs) अपनी साल के अंत की फंडिंग की जरूरतों को पूरा करने के लिए कमर्शियल पेपर (CP) मार्केट में 55% की बड़ी छलांग लगाकर ₹70,300 करोड़ जुटाने में कामयाब रहीं, वहीं दूसरी ओर कॉर्पोरेशन्स ने अपने खजाने को सुरक्षित रखते हुए CP जारी करना 35% घटाकर ₹26,600 करोड़ पर ला दिया। यह ट्रेंड ऐसे समय में सामने आया है जब लिक्विडिटी टाइट हो रही है और उधार की लागतें लगातार बढ़ रही हैं।
ऊंची उधार लागत की मुख्य वजहें
इन ऊंचे उधार दरों के पीछे कई कारण हैं। अमेरिका के फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) की ब्याज दरों में बढ़ोतरी, मिडिल ईस्ट में बढ़ता जियो-पॉलिटिकल टेंशन, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और रुपये का कमजोर होना भारतीय व्यवसायों के लिए कैपिटल की लागत बढ़ा रहा है। इससे महंगाई की चिंताएं और बाजार का भरोसा कम हुआ है। भारत के बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी की कमी और भी बढ़ गई है, जिसका मुख्य कारण बड़े टैक्स पेमेंट्स (जैसे एडवांस टैक्स और GST) और रुपये को संभालने के लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा उठाए गए कदम हैं। RBI ने रेपो ऑक्शन के ज़रिए लिक्विडिटी डाली, लेकिन यह सिस्टम से निकले पैसे की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं रही, जिससे Overnight बॉरोइंग रेट्स तेज़ी से बढ़ गए।
बैंकों पर बढ़ा फंड का दबाव
इस लिक्विडिटी क्रंच ने बैंकों को महंगी होलसेल फंडिंग, विशेषकर सर्टिफिकेट्स ऑफ डिपॉजिट (CDs) पर अधिक निर्भर बना दिया है। कुल आउटस्टैंडिंग CD इश्यू रिकॉर्ड स्तर पर हैं, और बैंकों को ऊंची फंडिंग कॉस्ट का सामना करना पड़ रहा है। मार्च 2026 में तीन महीने के CD रेट 7% के पार निकल गए। सिस्टम में क्रेडिट-टू-डिपॉजिट रेशियो लगभग 82-83% है, जो यह दिखाता है कि बैंकों को लोन देने के लिए पर्याप्त डिपॉजिट जुटाने में खासी मुश्किल हो रही है।
मार्केट रिस्क और मार्जिन पर संभावित असर
ऊंची दरों और टाइट लिक्विडिटी के बावजूद NBFCs का महंगी शॉर्ट-टर्म डेट की ओर यह झुकाव, संभावित अंदरूनी वित्तीय दबाव का संकेत दे सकता है। फाइनेंशियल ईयर के अंत में फंडिंग की जरूरत आम है, लेकिन यह भारी मात्रा उन जरूरतों को दर्शाती है जिन्हें इंटरनल फंड या लॉन्ग-टर्म लोन से पूरा करना कठिन हो सकता है। बैंकों के लिए, डिपॉजिट ग्रोथ से तेज़ क्रेडिट ग्रोथ को पूरा करने हेतु महंगी CDs पर निर्भरता FY27 में उनके मुनाफे और नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) के लिए एक बड़ा खतरा पैदा कर सकती है। टाइट लिक्विडिटी, जिसे जियो-पॉलिटिकल रिस्क और करेंसी में अस्थिरता ने और बढ़ाया है, डेट मार्केट में रिस्क के व्यापक पुनर्मूल्यांकन की ओर ले जा सकती है। इससे कंपनियों की उधार लागत बढ़ सकती है और आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ सकती हैं।
आगे के लिए फंडिंग का आउटलुक
एनालिस्ट्स का मानना है कि उधार लेने के पैटर्न में यह अंतर आने वाले फाइनेंशियल ईयर में भी जारी रहने की संभावना है। NBFCs से उम्मीद की जाती है कि वे अपनी फंडिंग की जरूरतों के लिए शॉर्ट-टर्म डेट मार्केट का इस्तेमाल जारी रखेंगी। वहीं, कॉर्पोरेट्स से उम्मीद है कि वे लागतों और इंटरनल कैश रिजर्व पर ध्यान केंद्रित करते हुए चुनिंदा बनी रहेंगी। बैंकिंग सेक्टर को डिपॉजिट आकर्षित करने में लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जिसका अर्थ है कि फंडिंग का दबाव और संबंधित लागतें FY27 तक बैंक के मार्जिन और रणनीतियों को प्रभावित करती रहेंगी।