जून 2026 तक भारत के NBFCs ने नए कंज्यूमर लोन के **47%** मार्केट को अपने नाम कर लिया है। हालांकि सेक्टर की एसेट क्वालिटी में सुधार हुआ है, लेकिन निवेशकों की नजर बढ़ती फंडिंग कॉस्ट और रेगुलेटरी सख्ती पर टिकी है।
भारतीय कंज्यूमर क्रेडिट मार्केट में NBFCs अब एक बड़ी ताकत बनकर उभरे हैं। जून 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, नए-टू-क्रेडिट (NTC) लोन ओरिजिनेशन में NBFCs की हिस्सेदारी 47% तक पहुंच गई है। FIDC और TransUnion CIBIL की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के कुल क्रेडिट-एक्टिव कंज्यूमर अकाउंट्स में से 46% अब NBFCs के पास हैं।
छोटे लोन में दबदबा
यह ग्रोथ मुख्य रूप से ₹2 लाख से कम के छोटे लोन (Small-ticket loans) के कारण है। पारंपरिक बैंक जहां इस सेगमेंट में सुस्त थे, वहीं NBFCs ने सेमी-अर्बन और ग्रामीण इलाकों में अपनी पैठ बनाकर इस क्रेडिट गैप को बखूबी भरा है।
रणनीति में बड़ा बदलाव
एक दशक पहले जहां फोकस सिर्फ नए ग्राहक जोड़ने पर था, अब NBFCs मौजूदा ग्राहकों को बनाए रखने (Customer Retention) पर ध्यान दे रहे हैं। इसी का नतीजा है कि नए ओरिजिनेशन में पहली बार लोन लेने वालों की संख्या साल 2016 के 28% से गिरकर 2026 में 16% पर आ गई है। अब कंपनियाँ पुराने और भरोसेमंद ग्राहकों को क्रॉस-सेलिंग पर ज्यादा जोर दे रही हैं।
बेहतर होती एसेट क्वालिटी
सेक्टर में सुधार का संकेत इसकी एसेट क्वालिटी से मिलता है। सिस्टमिक डेलिक्वेंसी रेट (90 दिन से ज्यादा देरी वाले लोन) 2.7% से घटकर अब 1.1% रह गए हैं। इसके अलावा, बेहतर क्रेडिट प्रोफाइल वाले (Above-prime) उधारकर्ताओं की हिस्सेदारी बढ़कर 32% हो गई है।
चुनौती और रेगुलेशन
इतनी ग्रोथ के बावजूद, निवेशकों के लिए कुछ चिंताएं भी हैं। फंडिंग की बढ़ती लागत (Rising cost of funding) प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव डाल सकती है। साथ ही, Reserve Bank of India (RBI) की अनसिक्योर्ड लोन पर बढ़ती नजर ने रेगुलेटरी माहौल को और सख्त बना दिया है। बैंकों और NBFCs के लिए बढ़े हुए रिस्क-वेट नियमों के चलते अब कंपनियों को अपनी अंडरराइटिंग को और अधिक चुनिंदा बनाना होगा।
