NBFCs का जलवा: जून में रिटेल लेंडिंग में **20%** की बंपर ग्रोथ, बैंकों को छोड़ा पीछे

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AuthorAditya Rao|Published at:
NBFCs का जलवा: जून में रिटेल लेंडिंग में **20%** की बंपर ग्रोथ, बैंकों को छोड़ा पीछे

जून के महीने में नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियां (NBFCs) रिटेल लेंडिंग में बैंकों से आगे निकल गई हैं। गोल्ड लोन (Gold Loan) और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स (Consumer Durables) की वजह से इनकी ग्रोथ **20.3%** रही। वहीं, बैंकों ने क्रेडिट कार्ड (Credit Card) और छोटे लोन (Small Ticket Lending) को लेकर सावधानी बरती, जिससे उनकी ग्रोथ धीमी रही। NBFCs ने बाजार की इस मांग को भुनाया है। अब देखना होगा कि इस तेज विस्तार का भविष्य में एसेट क्वालिटी (Asset Quality) और रेगुलेटरी कंप्लायंस (Regulatory Compliance) पर क्या असर पड़ता है।

NBFCs की बंपर ग्रोथ का राज

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के जून 2026 के आंकड़ों के अनुसार, रिटेल क्रेडिट में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों (NBFCs) ने रिटेल लोन में सालाना आधार पर 20.3% की जबरदस्त ग्रोथ दर्ज की है, जो कि बैंकों की 16% ग्रोथ से कहीं ज्यादा है। जून के अंत तक NBFCs द्वारा दिया गया कुल क्रेडिट ₹59.31 लाख करोड़ तक पहुंच गया, जो पिछले साल की तुलना में कुल क्रेडिट ग्रोथ 14.4% दर्शाता है।

गोल्ड लोन और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स की बढ़ी मांग

NBFCs की इस ग्रोथ का मुख्य कारण कुछ खास सेगमेंट में ग्राहकों की मजबूत मांग है। गोल्ड ज्वेलरी (Gold Jewellery) पर लोन 69.3% बढ़कर ₹3.41 लाख करोड़ हो गया, जबकि कंज्यूमर ड्यूरेबल्स (Consumer Durables) के लिए फाइनेंसिंग में 46.8% का इजाफा हुआ। ये सेगमेंट नॉन-बैंक लेंडर्स के लिए ग्रोथ का एक अहम जरिया बन गए हैं, जिससे वे ऐसी ग्रोथ हासिल कर पा रहे हैं जिसे पारंपरिक बैंक छोड़ रहे हैं।

बैंकों का रूढ़िवादी रवैया

दूसरी ओर, बैंकिंग सेक्टर ने रिटेल लेंडिंग में ज्यादा सावधानी भरा रवैया अपनाया है। बैंकों के क्रेडिट कार्ड (Credit Card) ग्रोथ में काफी धीमी गति देखी गई है, जो सालाना आधार पर केवल 2% रही। इसके अलावा, कई बैंकों ने कंज्यूमर ड्यूरेबल्स फाइनेंसिंग मार्केट से दूरी बना ली है, क्योंकि वे इन छोटे लोन को कम आकर्षक मानते हैं। बैंकों के इस कदम ने NBFCs को रिटेल स्पेस में अपनी मार्केट हिस्सेदारी बढ़ाने का एक बड़ा मौका दिया है।

निवेशकों के लिए क्या है जोखिम?

NBFCs की यह आक्रामक रणनीति जहां ग्रोथ दिखाती है, वहीं निवेशकों के लिए कुछ संभावित जोखिम भी लेकर आती है। खासकर अनसिक्योर्ड (Unsecured) या कंज्यूमर सेगमेंट में लोन बुक को तेजी से बढ़ाना, भविष्य में एसेट क्वालिटी (Asset Quality) बनाए रखने में चुनौतियां पैदा कर सकता है। जैसे-जैसे ये लोन पुराने होंगे, ग्राहकों से पेमेंट वसूलने की क्षमता ही उनकी अंडरराइटिंग स्टैंडर्ड्स (Underwriting Standards) की असली परीक्षा होगी।

रेगुलेटरी और मैक्रो इकोनॉमिक फैक्टर्स

इसके अलावा, रेगुलेटरी माहौल (Regulatory Environment) भी एक अहम फैक्टर है। RBI फाइनेंशियल सेक्टर पर कड़ी नजर रखे हुए है, और गोल्ड व सिल्वर जैसे कोलेटरल (Collateral) पर लोन देने से संबंधित कोई भी नए नियम इन कंपनियों के कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं। साथ ही, NBFCs को महंगाई (Inflation) और ब्याज दरों (Interest Rates) में संभावित बदलाव जैसे मैक्रो इकोनॉमिक दबावों का भी सामना करना पड़ सकता है, जो लोन की मांग और फंड की लागत दोनों को प्रभावित कर सकते हैं।

आगे क्या देखें?

निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह होगा कि वे इन नए लोन के परफॉर्मेंस पर नजर रखें। सिर्फ लोन बुक की ग्रोथ रेट पर ध्यान देने के बजाय, यह देखना अहम होगा कि ये लेंडर्स अपने क्रेडिट कॉस्ट (Credit Cost) को कैसे मैनेज करते हैं और क्या वे इन हाई-डिमांड सेगमेंट्स में प्रतिस्पर्धा करते हुए स्थिर प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margin) बनाए रख पाते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.