Motilal Oswal की रिपोर्ट के अनुसार, नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज़ (NBFCs) फाइनेंशियल ईयर (FY) 2026 की चौथी तिमाही (Q4) में दमदार प्रदर्शन कर सकती हैं। ब्रोकरेज फर्म को उम्मीद है कि NBFCs की नेट इंटरेस्ट इनकम (Net Interest Income) में 15% सालाना (YoY) और प्री-प्रोविजन ऑपरेटिंग प्रॉफिट (Pre-provision Operating Profit) में 16% की बढ़ोतरी होगी। वहीं, पूरे NBFC सेक्टर के लिए प्रॉफिट आफ्टर टैक्स (PAT) में करीब 30% का शानदार उछाल आने का अनुमान है। अगर NBFC-माइक्रोफाइनेंस इंस्टीट्यूशन्स (MFIs) को छोड़ दें, तो PAT ग्रोथ लगभग 26% YoY रह सकती है। यह मजबूत प्रदर्शन बढ़ी हुई लेंडिंग वॉल्यूम और स्थिर मार्जिन का नतीजा है। उदाहरण के लिए, श्रीराम फाइनेंस (Shriram Finance) ने FY25 में 15.90% का रेवेन्यू ग्रोथ और 29.69% की अर्निंग्स ग्रोथ दर्ज की है। वहीं, आदित्य बिड़ला कैपिटल (Aditya Birla Capital) ने पिछले पांच सालों में 28.8% का सालाना प्रॉफिट ग्रोथ (CAGR) हासिल किया है।
हालांकि, वैश्विक घटनाएं (Global events) NBFCs के लिए बड़ी चुनौतियां पेश कर रही हैं। मध्य पूर्व (Middle East) में बढ़ते जियोपॉलिटिकल टेंशन के कारण कच्चे तेल की कीमतें $110 प्रति बैरल से ऊपर चली गई हैं। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल इम्पोर्ट करता है, इसलिए यह बढ़ोतरी सीधे तौर पर देश को प्रभावित करती है। हर $10 के कच्चे तेल के दाम बढ़ने पर भारत का इम्पोर्ट बिल सालाना $12-15 बिलियन तक बढ़ सकता है। इससे देश के बजट और इकोनॉमिक ग्रोथ पर काफी दबाव आएगा। विश्लेषकों का मानना है कि बढ़ती इनफ्लेशन और कमोडिटी कॉस्ट के कारण इनफ्लेशन जल्द ही 6-7% से ऊपर जा सकता है, जिससे स्टैगफ्लेशन का खतरा बढ़ गया है। साथ ही, तेल इम्पोर्ट के लिए डॉलर की बढ़ती मांग से भारतीय रुपये (Indian Rupee) पर भी दबाव आ सकता है। यह रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के लिए एक मुश्किल स्थिति है, जिसे इनफ्लेशन कंट्रोल और इकोनॉमिक ग्रोथ के बीच संतुलन बनाना होगा।
यह मैक्रो प्रेशर (macro pressures) खासकर व्हीकल फाइनेंसिंग सेगमेंट (vehicle financing segment) के लिए बेहद चिंताजनक है। कच्चे तेल के बढ़ते दाम से कमर्शियल व्हीकल ऑपरेटर्स (commercial vehicle operators) के लिए फ्यूल और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ गई है। इससे उनकी कैश फ्लो (cash flow) पर असर पड़ रहा है, जिससे वे नए वाहन खरीदने में देरी कर रहे हैं और कमर्शियल व्हीकल (CV) लोंस की क्रेडिट डिमांड धीमी पड़ गई है। छोटे ऑपरेटरों की कमाई कम हो रही है और लोन चुकाने की उनकी क्षमता कमजोर पड़ रही है, जिससे लोन डिफॉल्ट्स (loan defaults) बढ़ने का खतरा है। हालिया संघर्षों की शुरुआत के बाद से निफ्टी ऑटो इंडेक्स (Nifty Auto index) में लगभग 11% की गिरावट आ चुकी है। ऑटो मैन्युफैक्चरर्स (Auto manufacturers) को भी बढ़ती रॉ मटेरियल कॉस्ट (raw material costs) के कारण Q4 FY26 में 80 से 100 बेसिस पॉइंट्स (basis points) तक मार्जिन कंप्रेशन (margin compression) झेलना पड़ सकता है।
ऐसे अनिश्चित माहौल को देखते हुए, Motilal Oswal डायवर्सिफाइड लेंडर्स (diversified lenders) को प्राथमिकता दे रहा है। ये कंपनियां अपनी विभिन्न इनकम सोर्स (income sources) के कारण किसी भी सेक्टर के डाउनटर्न्स (downturns) को बेहतर तरीके से संभाल सकती हैं। ब्रोकरेज की टॉप पिक्स (top picks) में श्रीराम फाइनेंस लिमिटेड (Shriram Finance Ltd.), आदित्य बिड़ला कैपिटल लिमिटेड (Aditya Birla Capital Ltd.), एल एंड टी फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड (L&T Financial Services Ltd.), और पीएनबी हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (PNB Housing Finance Ltd.) शामिल हैं। श्रीराम फाइनेंस, जिसका मार्केट कैप ₹1.89 लाख करोड़ और पी/ई (P/E) 20.43 है, रिटेल एसेट फाइनेंसिंग में मजबूत पकड़ रखती है। आदित्य बिड़ला कैपिटल, जिसका मार्केट कैप ₹78,130 करोड़ और पी/ई 22.0 है, विभिन्न प्रकार की फाइनेंशियल सर्विसेज प्रदान करती है। एल एंड टी फाइनेंशियल सर्विसेज, जिसका वैल्यूएशन ₹68,047 करोड़ और पी/ई 24.27 है, के पास एक विविध पोर्टफोलियो है। वहीं, पीएनबी हाउसिंग फाइनेंस, जिसका वैल्यूएशन ₹20,438 करोड़ और पी/ई 9.10 है, हाउसिंग फाइनेंस सेगमेंट में काम करती है। हालांकि पूरे सेक्टर में FY26 में एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) ग्रोथ 12-18% रहने का अनुमान है, पर प्रदर्शन में असमानता देखी जा सकती है।
व्हीकल फाइनेंसर्स के अलावा, NBFC सेक्टर के अन्य सेगमेंट भी अपनी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। एसेट क्वालिटी (Asset quality) को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं, खासकर माइक्रो-फाइनेंस (microfinance) और अनसिक्योर्ड बिज़नेस लोंस (unsecured business loans) के मामले में, जिसके कारण कुछ एनालिस्ट NBFC-MFIs को 'Negative' रेटिंग दे रहे हैं। हालांकि, कुल NBFC AUM ग्रोथ 15-17% रहने का अनुमान है, लेकिन सख्त लेंडिंग स्टैंडर्ड्स (lending standards) और सिलेक्टिव फंडिंग (selective funding) FY26 में इस ग्रोथ को धीमा कर सकती है। मौजूदा हालात में कैपिटल एडिक्वेसी (capital adequacy) और फंडिंग कॉस्ट (funding costs) पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है, क्योंकि RBI की नीतियां और जियोपॉलिटिकल झटके इन पर असर डाल सकते हैं।
Q4 FY26 के लिए मजबूत आउटलुक के बावजूद, अंदरूनी संरचनात्मक मुद्दे (structural issues) और वर्तमान मैक्रो रिस्क (macro risks) सावधानी बरतने की सलाह देते हैं। उदाहरण के लिए, पीएनबी हाउसिंग फाइनेंस ने पिछले एक साल में अपने साथियों और ब्रॉडर मार्केट के मुकाबले खराब प्रदर्शन किया है, जिसका एक साल का रिटर्न -16.32% रहा है। पिछले पांच सालों में इसकी सेल्स ग्रोथ -2.03% रही है और रिटर्न ऑन इक्विटी (ROE) लगभग 11.6% है, जो सीमित प्रॉफिटेबिलिटी दिखाती है। श्रीराम फाइनेंस, मजबूत कमाई के बावजूद, 'Weak' प्राइस ट्रेंड दिखा रही है, जो संभावित शॉर्ट-टर्म गिरावट का संकेत देती है। एल एंड टी फाइनेंशियल सर्विसेज ने पांच सालों में केवल 2.46% की सेल्स ग्रोथ दिखाई है, और पिछले तीन सालों का ROE भी महज 7.23% रहा है। आदित्य बिड़ला कैपिटल के डिविडेंड (dividends) न देने और कम इंटरेस्ट कवरेज रेशियो (interest coverage ratio) के कारण, मजबूत ऐतिहासिक प्रॉफिट ग्रोथ के बावजूद, इसकी तत्काल वित्तीय फ्लेक्सिबिलिटी पर सवाल उठते हैं। होलसेल फंडिंग (wholesale funding) पर निर्भरता तब एक भेद्यता (vulnerability) साबित हो सकती है जब ब्याज दरें तेजी से बढ़ें या जियोपॉलिटिकल घटनाओं के कारण ग्लोबल कैपिटल फ्लो (capital flow) में बदलाव से लिक्विडिटी (liquidity) टाइट हो जाए। कच्चे तेल की कीमतों और इनफ्लेशन को प्रभावित करने वाली जियोपॉलिटिकल अस्थिरता जारी रहने पर, RBI इनफ्लेशन को कंट्रोल करने के लिए ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा रख सकता है। इससे पूरे वित्तीय सिस्टम में बोरिंग कॉस्ट (borrowing costs) बढ़ेगी और यहां तक कि अच्छी तरह से डायवर्सिफाइड लेंडर्स की एसेट क्वालिटी (asset quality) की भी परीक्षा होगी।