आरबीआई (RBI) के नियमों में संभावित बदलाव को देखते हुए नॉन-बैंकिंग फाइनेंसियल कंपनियां (NBFCs) अपनी ट्रेजरी टीमों को मज़बूत कर रही हैं। खबर है कि आरबीआई जल्द ही एनबीएफसी को टर्म मनी मार्केट में हिस्सा लेने की इजाज़त दे सकता है, जिससे उनके लिए फंड जुटाना आसान हो जाएगा।
क्यों हो रही है टीमों की भर्ती?
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) जल्द ही कुछ चुनिंदा नॉन-बैंकिंग फाइनेंसियल कंपनियों (NBFCs) को अन-कोलैटरलाइज्ड टर्म मनी मार्केट में भाग लेने की अनुमति देने के लिए ड्राफ्ट गाइडलाइन्स लाया है। यह बाज़ार, जहां 14 दिनों से ज़्यादा समय के लिए फंड उधार दिए या लिए जाते हैं, फिलहाल ज़्यादातर बैंकों के कब्ज़े में है। इस बड़े बदलाव को देखते हुए, कई एनबीएफसी अपनी ट्रेजरी (Treasury) विभागों में तरलता प्रबंधन (Liquidity Management) और शॉर्ट-टर्म डेट ऑपरेशन्स के माहिरों की भर्ती कर रही हैं।
फंड जुटाने का बदलेगा तरीका
अब तक, भारतीय एनबीएफसी अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए मुख्य रूप से बैंक से उधार, नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर्स (NCDs) और सिक्युरिटाइजेशन पर निर्भर रही हैं। लेकिन टर्म मनी मार्केट में उतरने से उनके बैलेंस शीट को संभालने के तरीके में बड़ा बदलाव आएगा। बैंक से मिलने वाले लोन के विपरीत, मनी मार्केट में ट्रेजरी टीमों को लिक्विडिटी की स्थितियों पर बारीकी से नज़र रखनी होती है और दिन भर सबसे अच्छी दरें हासिल करने के लिए लगातार ट्रेड करने होते हैं।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
निवेशकों के लिए सबसे बड़ा फायदा फंड की लागत (Funding Costs) में कमी आना हो सकता है। अगर प्रस्ताव को मंज़ूरी मिल जाती है, तो अच्छी रेटिंग वाली एनबीएफसी को सस्ता कैपिटल मिल सकता है। बाज़ार के अनुमानों के मुताबिक, ये कंपनियां मौजूदा तीन महीने के कॉमर्शियल पेपर (Commercial Paper) की दरों से 5 से 10 बेसिस पॉइंट तक कम दर पर उधार ले सकती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि बैंकों को मज़बूत एनबीएफसी के साथ सीधे असुरक्षित उधार में अपना अतिरिक्त लिक्विडिटी चैनल करना ज़्यादा आकर्षक लग सकता है।
बाज़ार पर क्या होगा असर?
इस कदम से पूरे बाज़ार में हलचल भी तेज़ हो सकती है। अनुमान है कि टर्म मनी मार्केट का टर्नओवर (Turnover) काफी बढ़ेगा। कुछ अनुमानों के मुताबिक, लागू होने के पहले साल में ही वॉल्यूम में 40% से 60% तक की बढ़ोतरी देखी जा सकती है। इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि तीन साल के भीतर, टर्नओवर दोगुना भी हो सकता है।
चुनौतियां और आगे का रास्ता
हालांकि, इस बदलाव के साथ ऑपरेशनल चुनौतियां भी आएंगी। जिन कंपनियों के पास एडवांस्ड ट्रेजरी इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है, उन्हें इन जोखिमों को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने के लिए नए सिस्टम और विशेषज्ञता में निवेश करना होगा। शेयरधारकों के लिए, सबसे अहम बात यह होगी कि कंपनियां बाज़ार की अस्थिरता (Volatility) को बढ़ाए बिना फंड की कुल लागत को सफलतापूर्वक कम कर पाती हैं या नहीं। निवेशकों को सेंट्रल बैंक द्वारा तय किए जाने वाले पात्रता मानदंडों (Eligibility Criteria) पर नज़र रखनी चाहिए, क्योंकि असल लागत लाभ इसी पर निर्भर करेगा।
