NBFCs ने तमिलनाडु के लोन रिकवरी कानून को दी चुनौती
मद्रास हाई कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर तमिलनाडु मनी लेंडिंग एंटिटीज (प्रिवेंशन ऑफ कोअर्सिव एक्शन्स) एक्ट, 2025 के खिलाफ दायर कानूनी चुनौती पर जवाब मांगा है। मद्रास हायर परचेज एसोसिएशन (MAHA), सेंटूर मोटर फाइनेंस और टोडी इन्वेस्टर्स (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड ने यह मुकदमा दायर किया है, जिसमें कहा गया है कि नया कानून असंवैधानिक है। यह एक्ट तमिलनाडु विधानसभा द्वारा 30 अप्रैल, 2025 को पारित किया गया था, जिसे राज्यपाल की मंजूरी 9 जून, 2025 को मिली और यह अपने नियमों के साथ 19 नवंबर, 2025 से प्रभावी हुआ।
कानूनी और संवैधानिक आपत्तियां
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह एक्ट और इसके नियम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(g) और 21 के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। उनका दावा है कि कानून मनमाना, अतार्किक है और राज्य विधायिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। MAHA, जो RBI द्वारा रेगुलेटेड NBFCs सहित 1,200 से अधिक संस्थाओं का प्रतिनिधित्व करती है, का कहना है कि भले ही यह एक्ट अनौपचारिक सूदखोरों को रोकने के लिए बनाया गया है, लेकिन यह वैध वित्तीय संस्थानों को अनुचित रूप से दंडित करता है जो रेगुलेटरी ढांचे का पालन करते हैं।
रेगुलेटरी ओवरलैप और अस्पष्टता की चिंताएं
एक प्रमुख कानूनी विवाद यह है कि क्या तमिलनाडु विधायिका के पास उन NBFCs और वित्तीय संस्थाओं से संबंधित कानून बनाने का अधिकार है, जिन पर पहले से ही भारतीय रिजर्व बैंक एक्ट, 1934 और RBI के निर्देशों के तहत नियंत्रण है। याचिकाकर्ताओं ने कानून में "जबरन वसूली की कार्रवाई" (coercive action) की अस्पष्ट परिभाषा पर भी चिंता जताई है, और इस अनिश्चितता के कारण एक्ट का दुरुपयोग मानक वसूली विधियों का उपयोग करने वाली संस्थाओं के खिलाफ होने की आशंका जताई है। एक्ट के तहत रजिस्ट्रेशन की आवश्यकताओं पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। याचिकाकर्ता मामले की सुनवाई के दौरान एक्ट के प्रवर्तन पर अस्थायी रोक लगाने की मांग कर रहे हैं।
उद्योग पर प्रभाव और पिछली चुनौतियां
तमिलनाडु मनी लेंडिंग एंटिटीज (प्रिवेंशन ऑफ कोअर्सिव एक्शन्स) एक्ट, 2025 का उद्देश्य कमजोर लोगों को शिकारी कर्ज और कठोर वसूली की रणनीति से बचाना है। यह डिजिटल प्लेटफॉर्म सहित विभिन्न मनी-लेंडिंग संस्थाओं पर लागू होता है, लेकिन शुरुआत में बैंकों और RBI-रजिस्टर्ड NBFCs को रजिस्ट्रेशन की आवश्यकता नहीं थी। हालांकि, जबरन वसूली की कार्रवाई (सेक्शन 20-26) से संबंधित एक्ट के कुछ हिस्से तमिलनाडु में काम करने वाले NBFCs पर लागू होते हैं। इससे NBFC कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक आरोप लगने की चिंताएं बढ़ गई हैं, यदि उधारकर्ता शिकायत करते हैं, भले ही NBFC RBI नियमों का पालन कर रहा हो, क्योंकि जबरन वसूली की कार्रवाई की परिभाषा व्यक्तिपरक हो सकती है। यह स्थिति कर्नाटक में संबंधित अध्यादेश के बाद देखी गई चुनौतियों के समान है, जिसके बारे में कुछ पर्यवेक्षकों का मानना है कि इससे रेगुलेटेड कर्जदाताओं के लिए भ्रम पैदा हुआ और कलेक्शन की दक्षता कम हुई। एक्ट में लोन रिकवरी के दौरान उत्पीड़न के लिए तीन से पांच साल की कैद और जुर्माने का प्रावधान है।
न्यायिक समीक्षा और रेगुलेटरी माहौल
मद्रास हाई कोर्ट का नोटिस एक्ट के संवैधानिक आधार की गहन कानूनी समीक्षा का संकेत देता है। यह चुनौती वित्तीय क्षेत्र में केंद्रीय बैंक की निगरानी के साथ राज्य-स्तरीय उपभोक्ता संरक्षण को संतुलित करने पर चल रही बहसों के बीच उत्पन्न हुई है। "राज्य के भीतर कार्य" (functioning) की व्यापक व्याख्या में शाखाओं वाली संस्थाएं या केवल वहां व्यवसाय करने वाली संस्थाएं शामिल हो सकती हैं, जिससे इन NBFCs के लिए कानून का दायरा बढ़ सकता है। अदालत का अंतिम निर्णय तमिलनाडु में NBFCs और अन्य वित्तीय संस्थाओं की परिचालन स्वतंत्रता और वसूली विधियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालने की उम्मीद है, जो संभवतः भविष्य की कानूनी चुनौतियों के लिए एक मिसाल कायम करेगा।
