भारतीय NBFC सेक्टर में लोन बुक तो **24%** की तेजी से बढ़ रही है, लेकिन फाइनेंशियल असेट्स में इनका हिस्सा गिरकर **12.7%** रह गया है। गोल्ड लोन में उछाल के बीच बैंकों और म्यूचुअल फंड्स से बढ़ती प्रतिस्पर्धा निवेशकों के लिए एक बड़ा 'वॉच-आउट' फैक्टर है।
भारतीय गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) के सामने एक अजीब विरोधाभास की स्थिति है। एक तरफ इनका ऑपरेशनल कामकाज तेजी से बढ़ रहा है, तो दूसरी तरफ फाइनेंशियल सेक्टर में इनका प्रभाव कम हो रहा है। Reserve Bank of India (RBI) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, NBFCs और हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों का कुल फाइनेंशियल असेट्स में हिस्सा घटकर 12.7% रह गया है, जो महामारी से पहले 13.9% हुआ करता था। साफ है कि बैंक और म्यूचुअल फंड्स अब निवेशकों की पूंजी तेजी से अपनी ओर खींच रहे हैं।
लोन बुक और ग्रोथ के आंकड़े
दिसंबर 2025 तक, NBFCs के लोन और एडवांस में 24% का इजाफा दर्ज किया गया है। गौर करने वाली बात यह है कि इस बढ़त में 75% हिस्सेदारी सिक्योर लेंडिंग की है। इंडस्ट्रियल क्रेडिट अभी भी सेक्टर का सबसे बड़ा हिस्सा बना हुआ है, जिसकी लोन बुक में हिस्सेदारी 45.4% है।
खास बात यह है कि गोल्ड-लोन सेगमेंट में पिछले साल के मुकाबले 60% की भारी उछाल देखी गई है, जिसका सीधा कारण सोने की बढ़ती कीमतें हैं। हालांकि, व्हीकल लोन की रफ्तार धीमी पड़ रही है, जो निवेशकों के लिए आने वाली तिमाहियों में रेवेन्यू प्रेशर का संकेत हो सकता है।
स्टेबिलिटी और रिस्क
वित्तीय सेहत के लिहाज से सेक्टर काफी मजबूत स्थिति में है। ग्रॉस बैड लोन रेशियो घटकर 2.7% और नेट बैड लोन रेशियो 0.9% पर स्थिर है। वहीं, कैपिटल-टू-रिस्क वेटेड एसेट्स रेशियो 25.2% के स्तर पर है, जो नियामक की 15% की जरूरत से काफी अधिक है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
NBFCs की उधारी (Borrowing) में 23.3% की वृद्धि हुई है, जिसमें बैंकों और मार्केट-आधारित डेट इंस्ट्रूमेंट्स पर निर्भरता बहुत ज्यादा है। इसका मतलब है कि सेक्टर का भविष्य पूरी तरह बैंकिंग स्टेबिलिटी और इंटरेस्ट रेट साइकल से जुड़ा हुआ है। बढ़ती प्रतिस्पर्धा और फंडिंग की बढ़ती लागत आने वाले समय में NBFCs के मार्जिन को कैसे प्रभावित करेगी, इस पर नजर रखना बेहद जरूरी है।
