नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियां (NBFCs) इस वित्तीय वर्ष में शिक्षा लोन (Education Loan) के एसेट्स में **20%** की ज़बरदस्त बढ़ोतरी की उम्मीद कर रही हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि ये कंपनियां अब अमेरिका की जगह यूके (UK) और यूरोप (Europe) की ओर अपना रुख कर रही हैं। अमेरिका में शिक्षा लोन की मांग थोड़ी धीमी पड़ी है, लेकिन NBFCs अपने पोर्टफोलियो को मज़बूत रखने के लिए दूसरे स्थिर बाज़ारों में पैसा लगा रही हैं।
अमेरिका से यूके और यूरोप की ओर बढ़ा फोकस
नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियां (NBFCs) शिक्षा लोन के बाज़ार में एक बड़ा बदलाव देख रही हैं, जहाँ छात्र और लेंडर अब अमेरिका से बाहर भी विकल्प तलाश रहे हैं। हाल के दिनों में अमेरिका में वीज़ा नियमों और वर्क परमिट को लेकर कुछ अनिश्चितताएं बढ़ी हैं, जिस वजह से NBFCs थोड़ा सतर्क हो गई हैं। नतीजतन, 31 मार्च 2026 तक, अमेरिका से जुड़े शिक्षा लोन पोर्टफोलियो का हिस्सा घटकर 43% रह गया है, जो एक साल पहले 54% था।
यूके और यूरोप में ग्रोथ
अमेरिका में धीमी पड़ती मांग को देखते हुए, NBFCs ने दूसरे देशों में अपनी पैठ बढ़ाई है। हाल के समय में यूनाइटेड किंगडम (UK) जाने वाले छात्रों के लिए लोन देने में 24% की बढ़ोतरी देखी गई है। अब यूके, शिक्षा लोन पोर्टफोलियो का 29% हिस्सा बनकर दूसरे सबसे बड़े डेस्टिनेशन के रूप में उभरा है। जर्मनी और आयरलैंड जैसे देश भी छात्रों के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं, क्योंकि वहाँ वीज़ा के नियम ज़्यादा स्थिर हैं और पढ़ाई के बाद काम करने के मौके भी साफ़ हैं। इसी विविधीकरण (Diversification) की वजह से इस वित्तीय वर्ष में शिक्षा लोन एसेट्स में 20% की बढ़ोतरी का अनुमान लगाया जा रहा है।
एसेट क्वालिटी और रीपेमेंट की स्थिति
निवेशकों के लिए, शिक्षा लोन बिज़नेस में एसेट क्वालिटी (Asset Quality) यानी लोन चुकाने की क्षमता एक अहम पहलू है। भूगोल बदलने के बावजूद, इंडस्ट्री के आंकड़े बताते हैं कि एसेट क्वालिटी स्थिर बनी हुई है। ज़्यादातर शिक्षा लोन में एक मोरेटोरियम पीरियड (Moratorium Period) होता है - यानी कोर्स के दौरान लोन की मूल राशि नहीं चुकानी पड़ती। जैसे-जैसे ये लोन मोरेटोरियम से बाहर आकर EMI में तब्दील हो रहे हैं, लेंडर्स छात्रों के नौकरी लगने के बाद के हालातों पर बारीकी से नज़र रख रहे हैं।
रिस्क और ध्यान देने योग्य बातें
20% की ग्रोथ का लक्ष्य एक स्वस्थ विस्तार को दर्शाता है, लेकिन लेंडर्स को अंतर्राष्ट्रीय नौकरी बाज़ार और दूसरे देशों के रेगुलेटरी बदलावों से जुड़े जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है। अगर यूके, जर्मनी या अन्य लोकप्रिय देशों में पढ़ाई के बाद काम करने की नीतियां ज़्यादा सख्त हो जाती हैं, तो छात्रों के लिए अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी पाना मुश्किल हो सकता है, जिससे लोन डिफॉल्ट का खतरा बढ़ जाएगा। इसके अलावा, चूंकि शिक्षा लोन एक लंबी अवधि के लिए होते हैं, इन देशों में कोई भी लगातार आर्थिक मंदी उधारकर्ताओं की लोन चुकाने की क्षमता पर दबाव डाल सकती है।
निवेशकों को आने वाले तिमाही नतीजों में लोन पोर्टफोलियो की संरचना पर नज़र रखनी चाहिए। मुख्य रूप से शिक्षा सेगमेंट के लिए नेट नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) रेश्यो, गैर-अमेरिकी देशों में लोन बांटने की दर में बदलाव और विदेश में पढ़ाई के प्रमुख बाज़ारों में किसी भी पॉलिसी बदलाव पर नज़र रखना ज़रूरी होगा, जो लोन की मांग या क्रेडिट परफॉर्मेंस को प्रभावित कर सकते हैं।
