भारतीय म्यूचुअल फंड्स (Mutual Funds) अब इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) के शेयरों को लेकर बिल्कुल नई रणनीति अपना रहे हैं। विदेशी पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) के उलट, ये फंड्स IPO के बाद लॉक-इन पीरियड खत्म होने पर तुरंत शेयर बेचने के बजाय उन्हें लंबे समय तक होल्ड कर रहे हैं।
क्या है नई रणनीति?
यह ट्रेंड खासकर स्मॉल-कैप स्टॉक्स (Small-Cap Stocks) में साफ दिख रहा है, जहाँ म्यूचुअल फंड्स कंपनी के फंडामेंटल ग्रोथ पोटेंशियल (Fundamental Growth Potential) को देखते हुए निवेश कर रहे हैं, न कि सिर्फ थोड़े समय के मुनाफे के लिए।
SEBI की स्टडी का खुलासा
सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) की एक हालिया स्टडी, जिसमें अप्रैल 2022 से अक्टूबर 2025 के बीच 242 IPOs का विश्लेषण किया गया, इस बात की पुष्टि करती है। स्टडी के अनुसार, एक साल की अवधि में, म्यूचुअल फंड्स ने अपने एंकर अलॉटमेंट (Anchor Allotment) का केवल 38% ही बेचा। वहीं, FPIs ने इसी दौरान 60% तक की बिकवाली कर दी। कई IPOs में तो म्यूचुअल फंड्स ने 30 दिनों के बाद भी एक भी शेयर नहीं बेचा, जो कि हाई कनविक्शन (High Conviction) का संकेत देता है।
एंकर इन्वेस्टर्स का फायदा
बड़े म्यूचुअल फंड हाउसेज के लिए एंकर इन्वेस्टर रूट (Anchor Investor Route) एक स्ट्रेटेजिक फायदा देता है। इससे उन्हें ऑफर प्राइस (Offer Price) पर बड़ी मात्रा में शेयर मिल जाते हैं, बिना स्टॉक प्राइस में अचानक उछाल लाए, जैसा कि ओपन मार्केट (Open Market) में बड़ी खरीदारी से होता है। एक बार पोजीशन सिक्योर होने के बाद, वैसी ही एंट्री पॉइंट मिलना मुश्किल होता है, इसलिए वे निवेशित रहना पसंद करते हैं। स्मॉल-कैप म्यूचुअल फंड कैटेगरी में हाई लिक्विडिटी (High Liquidity) भी इस रणनीति को सपोर्ट करती है, जिसके एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (Assets Under Management) बढ़कर ₹4.37 ट्रिलियन हो गए हैं।
उदाहरण और जोखिम
उदाहरण के तौर पर, Nippon India Small Cap Fund जैसी बड़ी फंड्स ने Omnitech Engineering जैसी कंपनियों में अपनी बड़ी हिस्सेदारी बनाए रखी है। यह बिजनेस फंडामेंटल्स में मजबूत विश्वास को दर्शाता है।
हालांकि, यह नहीं मान लेना चाहिए कि म्यूचुअल फंड्स का सपोर्ट हमेशा स्टॉक प्राइस को बढ़ाएगा। म्यूचुअल फंड्स भले ही ज्यादा धैर्य दिखा रहे हों, लेकिन IPO के बाद 30 और 90 दिनों के लॉक-इन पीरियड (Lock-in Period) का खत्म होना अभी भी प्राइस वोलैटिलिटी (Price Volatility) पैदा कर सकता है। लॉक-इन हटने पर कुछ निवेशक मुनाफावसूली कर सकते हैं, जिससे शेयर की कीमतों पर असर पड़ सकता है। साथ ही, एंकर इन्वेस्टर्स बाज़ार की बड़ी गिरावट या कंपनी-विशिष्ट जोखिमों से अछूते नहीं हैं। आखिर में, रिटेल निवेशकों के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि 90-दिन के लॉक-इन के बाद ये स्टॉक्स कैसा प्रदर्शन करते हैं।
