बाज़ार में लाल निशान, MFs की ग्रीन सिग्नल
यह निवेश ऐसे समय में आया जब व्यापक भारतीय शेयर बाज़ार में भारी गिरावट दर्ज की गई। मार्च महीने में सेंसेक्स (Sensex) और निफ्टी 50 (Nifty 50) दोनों में 11.5% की तीखी गिरावट आई। हालांकि, फाइनेंशियल सेक्टर की हालत और भी खराब थी; निफ्टी बैंक (Nifty Bank) इंडेक्स 17% और निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज (Nifty Financial Services) इंडेक्स 15.6% तक लुढ़क गए। यह मार्च 2020 के बाद इन इंडिसेज में दर्ज की गई सबसे बड़ी मासिक गिरावट थी। ऐसे में म्यूचुअल फंडों का फाइनेंशियल स्टॉक्स में इतना बड़ा निवेश एक 'कॉन्ट्रारियन' (contrarian) रणनीति का संकेत देता है, यानी मौजूदा दबावों के बावजूद भविष्य की रिकवरी पर दांव लगाना।
भू-राजनीतिक टेंशन और बढ़ती यील्ड्स का साया
मार्च में बाज़ार में आई इस मंदी के पीछे कई बड़े कारण थे। अमेरिका, ईरान और इजराइल के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tensions) ने महंगाई को लेकर चिंताओं को हवा दी, साथ ही कच्चे तेल की कीमतें भी ऊंचे स्तर पर बनी रहीं। इन सबके चलते, भारत की 10-वर्षीय सॉवरेन बॉन्ड यील्ड (sovereign bond yield) 37 बेसिस पॉइंट से ज्यादा बढ़कर 7% का स्तर पार कर गई, जो पिछले एक साल का उच्चतम बिंदु था।
बढ़ती बॉन्ड यील्ड्स (bond yields) बैंकों जैसे फाइनेंशियल संस्थानों के लिए सीधे तौर पर चिंता का विषय बन जाती हैं। इससे उनके सरकारी सिक्योरिटीज पोर्टफोलियो पर 'मार्क-टू-मार्केट' (mark-to-market) लॉस का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा रुपये को ऐतिहासिक निचले स्तरों के करीब बचाने के लिए की गई कार्रवाइयों ने भी फाइनेंशियल कंडीशंस को और टाइट किया, जिससे लिक्विडिटी (liquidity) कम हुई और बैंकों की प्रॉफिटेबिलिटी पर दबाव पड़ा।
FIIs की बिकवाली, MFs की खरीदारी
जहां म्यूचुअल फंड्स फाइनेंशियल सेक्टर की ओर झुके, वहीं विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने बिल्कुल विपरीत रास्ता अपनाया। मार्च में FIIs ने भारतीय इक्विटी में ताबड़तोड़ बिकवाली की, जिसमें कुल मिलाकर लगभग ₹1.26 लाख करोड़ के शेयर बेच दिए गए। फाइनेंशियल स्टॉक्स FIIs के निशाने पर रहे, जहाँ से उन्होंने लगभग ₹60,000 करोड़ की बिकवाली की। ऑटो, कंस्ट्रक्शन और मेटल स्टॉक्स से भी बड़ा आउटफ्लो देखा गया। इस बिकवाली के कारण मार्च में भारतीय इक्विटी में FIIs की हिस्सेदारी घटकर 15.14% रह गई, जो फरवरी में 15.5% थी। यह दोनों तरह के निवेशकों की भारतीय बाज़ार को लेकर अलग-अलग जोखिम धारणाओं को दर्शाता है।
वैल्यूएशन और आगे के जोखिम
फिलहाल, भारतीय फाइनेंशियल सर्विसेज सेक्टर लगभग 18 गुना अर्निंग्स (earnings) पर ट्रेड कर रहा है। प्रमुख बैंक जैसे HDFC Bank 16x, ICICI Bank 18x, और SBI 10x के P/E पर हैं। बढ़ती बॉन्ड यील्ड्स सीधे तौर पर बैंकों के इन्वेस्टमेंट पोर्टफोलियो को प्रभावित कर सकती हैं; यील्ड में 100 बेसिस पॉइंट की एक छोटी सी बढ़ोतरी भी उनके बॉन्ड होल्डिंग्स पर बड़े अनरियलाइज्ड लॉस (unrealized loss) का कारण बन सकती है। ऐतिहासिक रूप से, भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ती यील्ड्स फाइनेंशियल स्टॉक्स में वोलेटिलिटी (volatility) बढ़ाती हैं।
लगातार बढ़ती महंगाई, जो मुख्य रूप से एनर्जी कीमतों से प्रेरित है, RBI को और मॉनेटरी टाइटनिंग (monetary tightening) के लिए मजबूर कर सकती है। इससे क्रेडिट ग्रोथ धीमी हो सकती है और बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (net interest margin) पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
भविष्य की राह और एनालिस्ट्स की राय
हालांकि, म्यूचुअल फंडों का यह लगातार निवेश भारतीय फाइनेंशियल सेक्टर की लॉन्ग-टर्म ग्रोथ पोटेंशियल (long-term growth potential) पर उनके विश्वास को दर्शाता है। एनालिस्ट्स (Analysts) मजबूत घरेलू मांग और डिजिटलाइजेशन को क्रेडिट ग्रोथ और फी इनकम (fee income) के महत्वपूर्ण ड्राइवर मानते हैं। पर, निकट अवधि में प्रदर्शन भू-राजनीतिक घटनाओं, महंगाई के रुझानों और RBI की मॉनेटरी पॉलिसी पर काफी हद तक निर्भर करेगा। मूल्यांकन (valuation) की चिंताएं, बढ़ती ब्याज दरें और धीमी ग्रोथ की सूरत में संभावित बैड लोन (bad loan) के जोखिमों को देखते हुए, ज़्यादातर ब्रोकरेज फर्मों (brokerage firms) ने इस सेक्टर के लिए 'होल्ड' (hold) या 'न्यूट्रल' (neutral) रेटिंग बनाए रखी है।