मुंबई ITAT ने स्पष्ट किया है कि अगर एम्प्लॉयर ने सैलरी से TDS काट लिया है, तो उसे सरकारी खजाने में जमा न करने पर कर्मचारी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। यह फैसला करदाताओं को बड़ी राहत देता है।
राहत भरा फैसला
मुंबई बेंच के इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) ने वेतनभोगी कर्मचारियों को बड़ी राहत दी है। अक्सर देखा जाता है कि एम्प्लॉयर सैलरी से TDS काट तो लेता है, लेकिन उसे सरकार के पास जमा नहीं करता, जिसका खामियाजा कर्मचारी को इनकम टैक्स डिपार्टमेंट से नोटिस के रूप में भुगतना पड़ता है। हाल ही में एक मामले में, एक IT प्रोफेशनल को ₹3.36 लाख का टैक्स डिमांड नोटिस मिला था, जबकि सबूतों के मुताबिक कंपनी ने ₹3.91 लाख का TDS काटा था।
कानून क्या कहता है?
ट्रिब्यूनल ने इनकम टैक्स एक्ट, 1961 के सेक्शन 205 का हवाला देते हुए कहा कि एक बार TDS कट जाने के बाद, टैक्स विभाग उसकी वसूली कर्मचारी से नहीं कर सकता। कानून साफ है—टैक्स जमा करने की जिम्मेदारी एम्प्लॉयर (Deductor) की है। अगर कर्मचारी यह साबित कर दे कि उसकी आय से टैक्स काटा गया था, तो उसे दोबारा टैक्स देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
पोर्टल की गलतियां और सबूत की ताकत
अक्सर फॉर्म 26AS या एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट (AIS) में विसंगतियों (Mismatch) के कारण सिस्टम जनरेटेड नोटिस आते हैं। ITAT ने साफ कर दिया है कि ऑटोमेटेड सिस्टम के आंकड़े अंतिम नहीं हैं। अगर कर्मचारी के पास सैलरी स्लिप, बैंक स्टेटमेंट और Form 16 जैसे वैध सबूत हैं, तो वे तकनीकी खामियों पर भारी पड़ेंगे। यह सिद्धांत सिर्फ सैलरी तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रोफेशनल फीस और डिविडेंड जैसे मामलों पर भी लागू होता है। एक्सपर्ट्स की सलाह है कि समय-समय पर अपने टैक्स रिकॉर्ड्स को रिकंसाइल करें और कागजी सबूतों को संभाल कर रखें, ताकि किसी भी गलत डिमांड को मजबूती से चुनौती दी जा सके।
