Mirae Asset Financial Services ने अपनी डिजिटल 'लोन अगेंस्ट सिक्योरिटीज' (LAS) प्लेटफॉर्म का विस्तार करते हुए अब CDSL डीमैट अकाउंट को भी शामिल कर लिया है। इससे निवेशक अपने लंबे समय के निवेश को बेचे बिना नकदी का इंतजाम कर सकते हैं, हालांकि उन्हें ब्याज लागत और शेयरों की कीमतों में गिरावट पर जबरन बिकवाली के जोखिमों का ध्यान रखना होगा।
डिजिटल प्लेजिंग (Pledging) कैसे काम करती है?
'लोन अगेंस्ट सिक्योरिटीज' (LAS) मूल रूप से निवेशकों को अपने शेयर पोर्टफोलियो को गारंटी के तौर पर इस्तेमाल करके लोन लेने की सुविधा देता है। लोन देने वाली कंपनी, कोलैटरल (जमानती संपत्ति) के मूल्य के एक निश्चित प्रतिशत के आधार पर लोन की राशि तय करती है, जिसे 'लोन-टू-वैल्यू' (LTV) रेश्यो कहा जाता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई कंपनी 40% LTV का ऑफर देती है, तो ₹10 लाख के शेयरों वाले निवेशक ₹4 लाख तक का लोन ले सकते हैं। Mirae Asset की वर्तमान सुविधा ₹25,000 से ₹1 करोड़ तक के लोन की अनुमति देती है, और ब्याज दरें हाल ही में लगभग 10.25% प्रति वर्ष देखी गई हैं।
हालांकि शेयर निवेशक के पोर्टफोलियो में ही बने रहते हैं और उन्हें डिविडेंड (Dividend) जैसे फायदे मिलते रहते हैं, लेकिन लोन का पूरा भुगतान होने तक प्लेज (Pledge) किए गए शेयरों को बेचा या ट्रांसफर नहीं किया जा सकता। यह सुविधा उन लोगों के लिए है जो अपनी लॉन्ग-टर्म (Long-term) मार्केट होल्डिंग (Holding) को बनाए रखते हुए शॉर्ट-टर्म (Short-term) लिक्विडिटी (Liquidity) चाहते हैं।
जोखिमों और मार्जिन की आवश्यकताएं समझें
निवेशकों के लिए LAS का सबसे बड़ा आकर्षण यह है कि वे कैपिटल गेन्स टैक्स (Capital Gains Tax) को ट्रिगर किए बिना नकदी जुटा सकते हैं, जो शेयर बेचने पर लागू होता। हालांकि, इस सुविधा के साथ कुछ खास जोखिम जुड़े हैं जिन पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता। सबसे बड़ा जोखिम बाजार की अस्थिरता (Volatility) है। यदि प्लेज किए गए शेयरों का मूल्य काफी गिर जाता है, तो LTV रेश्यो बढ़ जाता है, जो लोन देने वाले की सीमा का उल्लंघन कर सकता है।
ऐसी स्थिति में, लोन देने वाली कंपनी 'मार्जिन कॉल' (Margin Call) जारी करती है, जिसमें उधारकर्ता से लोन का एक हिस्सा चुकाने या अतिरिक्त कोलैटरल (Collateral) प्रदान करने की मांग की जाती है। यदि निवेशक इन मांगों को पूरा करने में असमर्थ रहता है, तो लोन देने वाली कंपनी के पास कानूनी अधिकार होता है कि वह लोन की राशि वसूलने के लिए खुले बाजार में प्लेज किए गए शेयरों की 'जबरन बिकवाली' (Forced Liquidation) कर दे। इससे निवेशक अपनी होल्डिंग्स को ठीक उसी समय खो सकता है जब वह कीमतों में रिकवरी की उम्मीद कर रहा हो।
रेगुलेटरी संदर्भ और बाजार का माहौल
मार्जिन ट्रेडिंग और लोन अगेंस्ट सिक्योरिटीज का बाजार काफी बढ़ा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत की मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी (MTF) बुक जून 2026 तक ₹1.4 लाख करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है। इस वृद्धि को देखते हुए, रेगुलेटर्स (Regulators) स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने फरवरी 2026 में LAS और मार्जिन ट्रेडिंग पर कड़े नियम लागू किए थे, जिनके अनुपालन की समय-सीमा 1 जुलाई 2026 से प्रभावी हुई। इन नियमों ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों के LAS पोर्टफोलियो को फंड करने और कोलैटरल आवश्यकताओं के प्रबंधन के तरीके को प्रभावित किया है।
निवेशकों को सलाह दी जाती है कि वे ऐसी सेवाओं का मूल्यांकन करते समय केवल ब्याज दर से आगे देखें। मुख्य बातों में लोन देने वाले के कोलैटरल वैल्यूएशन (Valuation) के तरीके, लोन लिमिट को एडजस्ट (Adjust) करने की फ्लेक्सिबिलिटी (Flexibility) और लोन को जल्दी चुकाने की शर्तें शामिल हैं। शेयर बेचने के विपरीत, जो एक साफ एग्जिट (Exit) बनाता है, लोन लेना एक जारी देनदारी (Liability) बनाता है जिसके लिए सक्रिय निगरानी की आवश्यकता होती है, खासकर बाजार में तनाव की अवधि के दौरान।
