भारतीय माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में बड़ी राहत! जून 2026 तक 'पोर्टफोलियो एट रिस्क' (PAR) घटकर **2.3%** पर आ गया है, जो पिछले साल इसी अवधि में **7.1%** था। यह सुधार बड़े राइट-ऑफ और बड़े लोन साइज पर फोकस के कारण हुआ है, हालांकि निवेशकों को लंबे डिफॉल्ट पर नजर रखनी होगी।
माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में आई तेजी
क्रेडिट ब्यूरो CRIF High Mark के नए आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय माइक्रोफाइनेंस सेक्टर ने एसेट क्वालिटी में जबरदस्त सुधार दिखाया है। जून 2026 तक, 'पोर्टफोलियो एट रिस्क' (PAR), यानी 180 दिनों तक के ऐसे लोन जो चुकाए नहीं गए हैं, घटकर सिर्फ 2.3% रह गए हैं। पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 7.1% था, जो एक बड़ी गिरावट दर्शाता है। इस सुधार से इंडस्ट्री के लोन बुक में अच्छी सेहत नजर आ रही है।
राइट-ऑफ का असर?
यह समझना जरूरी है कि यह सुधार आंशिक रूप से तकनीकी है। बढ़े हुए राइट-ऑफ (Bad Loans को बट्टे खाते में डालना) इस कमी का एक मुख्य कारण रहे हैं। जब लेंडर इन असेट्स को राइट-ऑफ कर देते हैं, तो वे एक्टिव लोन पोर्टफोलियो से हट जाते हैं, जिससे डिफॉल्सी परसेंटेज तुरंत कम हो जाता है। हालांकि, इससे डिफॉल्टर से वसूली का पता नहीं चलता।
बड़े लोन साइज पर फोकस
माइक्रोफाइनेंस संस्थानों के संचालन के तरीके में भी एक स्पष्ट बदलाव आया है। अब लेंडर बड़े लोन साइज की ओर बढ़ रहे हैं। जून 2026 के अंत तक औसत टिकट साइज बढ़कर ₹62,100 हो गया, जबकि एक साल पहले यह ₹53,600 था। इसका मतलब है कि कंपनियां नए, हाई-रिस्क वाले ग्राहक सेगमेंट में तेजी से विस्तार करने के बजाय मौजूदा, क्रेडिट-टेस्टेड ग्राहकों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रही हैं।
NBFC-MFIs की बढ़ती अहमियत
नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी-माइक्रोफाइनेंस इंस्टीट्यूशंस (NBFC-MFIs) इस माहौल में अपनी पैठ बढ़ा रही हैं। कुल माइक्रोफाइनेंस पोर्टफोलियो में इनकी हिस्सेदारी बढ़कर 44% हो गई, जो पिछले साल 38.8% थी। वहीं, कुल माइक्रोफाइनेंस डिसबर्समेंट में जून तिमाही में 20% की तिमाही-दर-तिमाही गिरावट आई और यह ₹61,100 करोड़ पर पहुंच गया। इस गिरावट का मुख्य कारण मौसमी कारक हैं।
निवेशकों के लिए खास बातें
हालांकि 2.3% का आंकड़ा सकारात्मक है, निवेशकों के लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि इसमें 180 दिनों से अधिक के डिफॉल्ट वाले लोन शामिल नहीं हैं। यदि इन्हें गिना जाता, तो स्ट्रेस लेवल 2.3% से अधिक हो सकता था। इसके अलावा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था मैक्रो इकोनॉमिक फैक्टर्स, जैसे बारिश और कृषि उत्पादन पर निर्भर करती है, जो सीधे तौर पर माइक्रो-बॉरोअर्स की लोन चुकाने की क्षमता को प्रभावित करते हैं। यह देखना होगा कि क्या मौजूदा रणनीति विकास को बनाए रख सकती है और क्या इंडस्ट्री राइट-ऑफ पर ज्यादा निर्भर हुए बिना एसेट क्वालिटी को बनाए रख सकती है।
