Microfinance Sector: बैंकों की रणनीति बदली, NBFC-MFIs का बाजार पर दबदबा बढ़ा

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Microfinance Sector: बैंकों की रणनीति बदली, NBFC-MFIs का बाजार पर दबदबा बढ़ा

जून 2026 तक भारत का माइक्रोफाइनेंस पोर्टफोलियो **₹3.3 लाख करोड़** तक पहुंच गया है। अब NBFC-MFIs ने **44.3%** मार्केट शेयर पर कब्जा कर लिया है, जबकि बैंकों का डायरेक्ट लेंडिंग हिस्सा घटकर **27%** रह गया है।

भारत के माइक्रो-लेंडिंग सेक्टर में जून 2026 के अंत तक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। इंडस्ट्री डेटा के मुताबिक, कुल पोर्टफोलियो ₹3.29 लाख करोड़ के आंकड़े को पार कर गया है, जिसमें NBFC-MFIs अब 44.3% हिस्सेदारी के साथ सबसे प्रमुख खिलाड़ी बनकर उभरे हैं।

बैंकों की बदलती रणनीति

दूसरी तरफ, कमर्शियल बैंकों का डायरेक्ट माइक्रोफाइनेंस पोर्टफोलियो घटकर 25% से 27% के बीच रह गया है। हालांकि, यह बैंकों के सेक्टर से बाहर निकलने का संकेत नहीं है। असल में, कई बैंकों ने अपने लोन पोर्टफोलियो को रीक्लासिफाई (reclassify) किया है और इन्हें रिटेल पोर्टफोलियो का हिस्सा बनाया है।

बैंक अभी भी माइक्रोफाइनेंस इकोसिस्टम की जान बने हुए हैं। ये NBFC-MFIs को जरूरी फंड का 80% से ज्यादा हिस्सा मुहैया कराते हैं। बैंक अब खुद सीधे लोन देने की मेहनत के बजाय NBFCs को फंड देने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, जिससे उनका ऑपरेशनल बोझ कम हो रहा है।

निवेशकों के लिए चेतावनी और रिस्क

सेक्टर में ग्रोथ के बावजूद कुछ चिंताएं बनी हुई हैं:

  • बढ़ता कर्ज: उधार लेने वालों पर कर्ज का बोझ बढ़ रहा है, जिससे भविष्य में डिफॉल्ट का रिस्क पैदा हो सकता है।
  • बड़े लोन का दबाव: ₹75,000 से ज्यादा के लोन में इजाफा हुआ है, जो पारंपरिक माइक्रोफाइनेंस के छोटे और सुरक्षित मॉडल के लिए एक नया रिस्क है।
  • परफॉर्मेंस ट्रैक: जून 2026 तक डेलिंक्वेंसी (PAR 31-180 दिन) 1.6% से 1.89% के दायरे में रही है। निवेशकों को आने वाले समय में एसेट क्वालिटी पर कड़ी नजर रखनी होगी।

भौगोलिक रूप से देखें तो एक्टिव बॉरोअर्स की संख्या गिरकर 6.5 करोड़ रह गई है, जबकि अब दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु में क्रेडिट डिमांड ज्यादा देखी जा रही है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.