भारत के माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में मई में **0.7%** की बढ़ोतरी देखी गई, जो पहले की सपाट चाल को तोड़ती है। इसके साथ ही, लोन की क्वालिटी में भी सुधार हुआ है और छोटे-मोटे पेमेंट में देरी में कमी आई है। यह रिकवरी लिस्टेड माइक्रोफाइनेंस संस्थानों और स्मॉल फाइनेंस बैंकों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह कर्जदारों की स्थिरता में सुधार का संकेत देता है।
क्या हुआ?
भारतीय माइक्रोफाइनेंस सेक्टर ने मई में रिकवरी के संकेत दिखाए हैं। पिछले महीने की तुलना में कुल लोन पोर्टफोलियो में 0.7% का इजाफा हुआ है। यह ग्रोथ इस साल की शुरुआत से दिख रही सुस्त चाल के उलट है। अप्रैल के आंकड़ों की तुलना में लोन बांटने (disbursement) की रकम में थोड़ी बढ़ोतरी के साथ, लेंडिंग एक्टिविटी स्थिर बनी रही। साथ ही, इंडस्ट्री में एक्टिव लोन की संख्या बढ़ी है, जो बताता है कि संस्थान ग्रामीण और अर्ध-शहरी ग्राहकों को क्रेडिट देना जारी रख रहे हैं।
एसेट क्वालिटी और रीपेमेंट का हाल
मई के आंकड़ों से सबसे अहम बात एसेट क्वालिटी में सुधार है। 1-30 दिनों तक के बकाया लोन का पोर्टफोलियो एट रिस्क (PAR) मई में घटकर 0.6% रह गया, जो अप्रैल में 0.8% था। PAR एक महत्वपूर्ण इंडस्ट्री मेट्रिक है जो डिफॉल्ट के जोखिम वाले लोन का प्रतिशत दिखाता है। कम आंकड़ा आम तौर पर यह बताता है कि कर्जदारों को अपने ड्यूज चुकाने में आसानी हो रही है। 91-180 दिनों तक के बकाया लोन में भी 0.9% की गिरावट आई। हालांकि 31-90 दिनों की देरी वाले बकेट में मामूली बढ़ोतरी हुई, लेकिन कुल मिलाकर छोटे-मोटे पेमेंट में जोखिम में कमी आना कर्ज देने वालों के बैलेंस शीट के लिए एक सकारात्मक संकेत है।
लेंडर मिक्स और रीजनल परफॉरमेंस
नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी-माइक्रोफाइनेंस इंस्टीट्यूशंस (NBFC-MFIs) का मार्केट शेयर सबसे बड़ा बना हुआ है, जो कुल लोन बुक का 43% से अधिक है। बाकी हिस्सेदारी बैंकों, स्मॉल फाइनेंस बैंकों और अन्य NBFCs की है। भौगोलिक रूप से, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने 1.2% और 1.3% की वृद्धि के साथ ध्यान खींचा। यह दर्शाता है कि इन घनी आबादी वाले क्षेत्रों में माइक्रो-क्रेडिट की मांग मजबूत बनी हुई है। इसके विपरीत, कुछ अन्य प्रमुख राज्यों में धीमी ग्रोथ या मामूली गिरावट देखी गई, जो इस बिजनेस के स्थानीय नेचर को दर्शाता है।
निवेशकों के लिए क्यों मायने रखता है?
लिस्टेड माइक्रोफाइनेंस कंपनियों जैसे CreditAccess Grameen, Fusion Micro Finance, Spandana Sphoorty, और विभिन्न स्मॉल फाइनेंस बैंकों के शेयरधारकों के लिए ये ट्रेंड्स बहुत अहम हैं। डिफॉल्ट्स को कंट्रोल में रखते हुए लोन बुक को बढ़ाने की सेक्टर की क्षमता सीधे प्रॉफिटेबिलिटी को प्रभावित करती है। जब एसेट क्वालिटी में सुधार होता है, तो कंपनियों को प्रोविजन्स (संभावित नुकसान के खिलाफ एक सुरक्षा बफर) के रूप में कम पैसा अलग रखना पड़ता है, जो उनके बॉटम लाइन को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है।
आगे निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
निवेशकों को बारीकी से निगरानी करनी चाहिए कि क्या यह ग्रोथ ट्रेंड आने वाले महीनों में जारी रहता है। लिस्टेड कंपनियों के मैनेजमेंट की तरफ से अंडरराइटिंग स्टैंडर्ड्स पर आने वाली कमेंट्री मुख्य देखने लायक बात होगी। जबकि समग्र रूप से बकाया लोन का डेटा उत्साहजनक है, यह सेक्टर मौसमी कारकों जैसे मौसम के पैटर्न और ग्रामीण आर्थिक चक्रों के प्रति संवेदनशील है, जो कर्जदारों की रीपेमेंट क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। आने वाली तिमाहियों में उनके प्रदर्शन का आकलन करने के लिए यह देखना आवश्यक होगा कि ये संस्थान स्थिर लोन मांग के बीच अपने मार्जिन को कैसे मैनेज करते हैं।
