माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में एक बड़ा बदलाव दिख रहा है, जहां **98.1%** कर्ज का पैसा सिर्फ बड़े संस्थानों के पास जा रहा है। बैंकों की सतर्कता के चलते छोटे प्लेयर्स के लिए लिक्विडिटी का संकट बढ़ गया है, जो आने वाले समय में इंडस्ट्री में बड़े कंसोलिडेशन का संकेत है।
बैंकों की बदली रणनीति
भारतीय माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में कैपिटल का फ्लो अब चुनिंदा हाथों में सिमट गया है। ताजा डेटा के मुताबिक, जिन संस्थानों के पास ₹2,000 करोड़ से ज्यादा के एसेट्स हैं, उन्होंने कुल डेट फंडिंग का 98.1% हिस्सा हासिल कर लिया है। बैंक इस समय रिस्क लेने से बच रहे हैं और अपनी पूंजी सुरक्षित रखने के लिए केवल बड़े और रेटिंग में मजबूत NBFC-MFIs को ही प्राथमिकता दे रहे हैं।
दो हिस्सों में बंटा बाजार
सेक्टर में 80% से ज्यादा फंड बैंकों के जरिए आता है, जो अब 'सेफ्टी फर्स्ट' की अप्रोच अपना रहे हैं। इसके चलते छोटी कंपनियों के लिए लिक्विडिटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। कई छोटी कंपनियां ऐसी हैं जिन्हें इस तिमाही में कोई नई फंडिंग नहीं मिली है, जिससे उनके लोन पोर्टफोलियो का विस्तार रुक गया है।
पोर्टफोलियो और एसेट क्वालिटी
चुनौतियों के बावजूद सेक्टर का प्रदर्शन लचीला बना हुआ है। वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में इंडस्ट्री का कुल पोर्टफोलियो बढ़कर ₹3.29 लाख करोड़ हो गया है, जिसमें 1.1% की तिमाही वृद्धि दर्ज की गई है। एसेट क्वालिटी की बात करें तो, 31 से 180 दिन तक ओवरड्यू रहने वाले लोन (Portfolio at Risk) गिरकर 1.6% पर आ गए हैं, जो पिछले साल इसी समय 5.6% थे।
निवेशकों के लिए चेतावनी
शेयरहोल्डर्स के लिए सबसे बड़ा जोखिम 'इंडस्ट्री कंसोलिडेशन' है। कर्ज न मिलने की स्थिति में छोटी कंपनियां या तो बड़ी कंपनियों के साथ मर्ज हो सकती हैं या बाजार से बाहर हो सकती हैं। निवेशकों को अब सरकारी स्कीम CGSMFI 2.0 पर नजर रखनी चाहिए, जिसके जरिए ₹20,000 करोड़ की लिक्विडिटी लाने का लक्ष्य रखा गया है। अगर यह स्कीम छोटे प्लेयर्स की फंडिंग की समस्या दूर नहीं कर पाई, तो आने वाली तिमाहियों में छोटे और मझोले लेंडर्स की प्रॉफिटेबिलिटी पर भारी दबाव देखने को मिल सकता है।
