माइक्रोफाइनेंस के बदले तेवर: किसान लोन से पर्सनल कर्ज़ की ओर बढ़ते लोग

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
माइक्रोफाइनेंस के बदले तेवर: किसान लोन से पर्सनल कर्ज़ की ओर बढ़ते लोग

भारत में माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। अब छोटे कर्ज़दार खेती-किसानी के बजाय पर्सनल और कंजम्पशन लोन (Consumption Loan) की ओर ज़्यादा आकर्षित हो रहे हैं। यह ट्रेंड जहाँ वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) को दर्शाता है, वहीं यह भी चिंताएं बढ़ाता है कि कमज़ोर तबके पर कर्ज़ का बोझ बढ़ रहा है। ऐसे में, यह देखना अहम होगा कि लेंडर्स इस बदलते लोन मिक्स के बीच क्रेडिट क्वालिटी (Credit Quality) को कैसे मैनेज करते हैं।

कर्ज़ का बदलता मिजाज: खेती से कंजम्पशन की ओर?

पिछले एक दशक में भारत के माइक्रोफाइनेंस परिदृश्य में बड़ा बदलाव आया है। पहले ये लोन छोटे बिज़नेस और खेती-किसानी को सहारा देने के लिए दिए जाते थे, जिससे ग्रामीण आबादी को फॉर्मल बैंकिंग सिस्टम में आने का मौका मिलता था। लेकिन, हालिया क्रेडिट ब्यूरो डेटा, जो TransUnion CIBIL से आया है, बताता है कि अब ज़्यादातर माइक्रोफाइनेंस ग्राहक खेती के लिए कर्ज़ लेने के बजाय अपनी निजी ज़रूरतों और खपत के लिए लोन ले रहे हैं।

कंजम्पशन लोन का बढ़ता चलन

फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) 2025-26 के आंकड़ों के मुताबिक, अनसिक्योर्ड पर्सनल रिटेल लोन (Unsecured Personal Retail Loan) लेने वाले माइक्रोफाइनेंस ग्राहकों का शेयर बढ़कर 12% हो गया है, जो फाइनेंशियल ईयर 2016-17 में महज़ 3% था। इसी तरह, कंज्यूमर ड्यूरेबल लोन (Consumer Durable Loan) लेने वालों की संख्या 6% से बढ़कर 11% हो गई है। दूसरी ओर, खेती से जुड़े माइक्रोलोन (Farm Microloan) पर निर्भरता काफी कम हो गई है, जो एक दशक पहले 22% थी, वह अब घटकर सिर्फ 3% रह गई है। इससे साफ ज़ाहिर होता है कि कर्ज़दार अब आय-उत्पादक कृषि गतिविधियों से हटकर रिटेल-आधारित खपत की ओर बढ़ रहे हैं।

ग्राहकों पर कर्ज़ का बोझ और वित्तीय जोखिम

पर्सनल लोन की ओर यह बदलाव वित्तीय सेक्टर के लिए एक 'दोधारी तलवार' साबित हो सकता है। एक तरफ, यह दर्शाता है कि माइक्रोफाइनेंस ग्राहक अब फॉर्मल क्रेडिट चैनलों का इस्तेमाल करने और ज़्यादा वित्तीय प्रोडक्ट्स तक पहुंचने में सहज महसूस कर रहे हैं। वहीं, दूसरी तरफ, इसने प्रति ग्राहक कुल कर्ज़ (Total Debt Per Borrower) में बढ़ोतरी की है। मार्च 2026 तक, लगभग 18% माइक्रोफाइनेंस ग्राहकों के पास एक या अधिक रिटेल लोन थे, जबकि दस साल पहले यह आंकड़ा 14% था।

कम आय वाले परिवारों में बढ़ता कर्ज़ चुकाने का दबाव बढ़ा सकता है, खासकर तब जब उनकी आमदनी कर्ज़ की किश्तों के साथ तालमेल न बिठा पाए। ऐसे में, लेंडर्स के लिए यह बेहद ज़रूरी हो गया है कि वे उन ग्राहकों की क्रेडिट-वर्थीनेस (Creditworthiness) का सही अंदाज़ा लगाएं जो एक साथ कई अनसिक्योर्ड लोन मैनेज कर रहे हैं।

रेगुलेटरी माहौल और आगे की निगरानी

हाल के महीनों में, इंडस्ट्री ने ज़्यादा अनुशासित लेंडिंग (Disciplined Lending) पर जोर दिया है। फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस (Financial Institutions) सावधानी बरत रहे हैं, क्योंकि रेगुलेटरी गाइडेंस (Regulatory Guidance) के ज़रिए एक ही ग्राहक को बार-बार लोन देने के चलन पर रोक लगाने की कोशिश की जा रही है। इन कदमों का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि क्रेडिट ग्रोथ (Credit Growth) टिकाऊ बनी रहे और बैड लोन (Bad Loans) का आंकड़ा न बढ़े।

निवेशकों और स्टेकहोल्डर्स (Stakeholders) के लिए, माइक्रोफाइनेंस पर केंद्रित बैंकों और नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) की एसेट क्वालिटी (Asset Quality) पर नज़र रखना सबसे अहम होगा। आने वाले समय में पता चलेगा कि क्या ये संस्थान अपने पोर्टफोलियो में अनसिक्योर्ड रिटेल क्रेडिट का एक्सपोजर बढ़ने के बावजूद हेल्दी कलेक्शन रेट (Collection Rate) बनाए रख पाते हैं। साथ ही, अनसिक्योर्ड लेंडिंग कैप्स (Unsecured Lending Caps) और क्रेडिट ब्यूरो रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड्स (Credit Bureau Reporting Standards) पर भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India) के किसी भी नए पॉलिसी अपडेट पर भी नज़र रखी जाएगी, क्योंकि ये सीधे तौर पर सेक्टर की ग्रोथ की दिशा तय करेंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.