Mental Health Insurance: क्या आपकी पॉलिसी में थेरेपी कवर है? अक्सर क्‍लेम हो जाता है रिजेक्ट

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AuthorMehul Desai|Published at:
Mental Health Insurance: क्या आपकी पॉलिसी में थेरेपी कवर है? अक्सर क्‍लेम हो जाता है रिजेक्ट

कानूनी रूप से मानसिक स्वास्थ्य कवर अनिवार्य होने के बावजूद, कई इंश्योरेंस कंपनियां केवल हॉस्पिटल में भर्ती होने पर ही भुगतान करती हैं। आउटपेशेंट थेरेपी (Outpatient therapy) अक्सर पॉलिसी से बाहर रह जाती है, जिससे पॉलिसीधारकों को अचानक जेब से खर्च करना पड़ता है।

भारत में Mental Healthcare Act 2017 और IRDAI के निर्देशों के मुताबिक, इंश्योरेंस कंपनियों को मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य के समान ही कवर करना अनिवार्य है। इसके बावजूद, कानूनी नियमों और वास्तविक पॉलिसी के बीच एक बड़ा गैप मौजूद है। कई पॉलिसीधारक यह मानकर चलते हैं कि उनका मेंटल हेल्थ कवर है, लेकिन जब वे इलाज के लिए जाते हैं, तो उन्हें पता चलता है कि ओपीडी (OPD) थेरेपी का खर्च कवर नहीं होता।

इन-पेशेंट (In-patient) बनाम आउट-पेशेंट (Out-patient) का अंतर

ज्यादातर स्टैंडर्ड हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी 'Indemnity-based' होती हैं, जिसका मतलब है कि खर्च तभी कवर होगा जब आप अस्पताल में भर्ती (Hospitalization) होंगे। थेरेपी और साइकियाट्रिक कंसल्टेशन आमतौर पर बिना भर्ती हुए (Outpatient) लिए जाते हैं। अस्पताल में भर्ती न होने के कारण, अक्सर कंपनियां इनके क्लेम को यह कहकर रिजेक्ट कर देती हैं कि यह पॉलिसी की शर्तों के दायरे में नहीं आता।

'एक्सेस' (Access) बनाम रीइम्बर्समेंट (Reimbursement)

नियामकीय जरूरतों को पूरा करने के लिए, कई इंश्योरर अपने डिजिटल ऐप्स के जरिए सीमित काउंसलिंग सत्र प्रदान करते हैं। यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी ऐप के जरिए कुछ सत्र मिलना और खुद के चुने हुए थेरेपिस्ट से इलाज कराकर खर्च का रीइम्बर्समेंट पाना, दोनों अलग बातें हैं। अगर आपको लंबे समय तक एक ही प्रोफेशनल से थेरेपी लेनी है, तो ये ऐप-आधारित सेवाएं अक्सर नाकाफी साबित होती हैं।

पॉलिसी की बारीकियां कैसे समझें?

सिर्फ 'Total Sum Insured' देखकर पॉलिसी न चुनें। पॉलिसी के Customer Information Sheet (CIS) को ध्यान से पढ़ें। यह देखें कि क्या आउटपेशेंट थेरेपी बेस पॉलिसी का हिस्सा है या इसके लिए अलग से 'राइडर' (Rider) की जरूरत है। साथ ही, प्रति सत्र (Per session) खर्च की सीमा की जांच भी जरूर करें।

क्लेम रिजेक्ट होने पर क्या करें?

अगर आपका क्लेम रिजेक्ट हो जाता है, तो कंपनी से लिखित में स्पष्टीकरण मांगें कि उन्होंने किस क्लॉज के आधार पर इसे खारिज किया है। यदि आपको लगता है कि कंपनी ने गलत व्याख्या की है, तो आप कंपनी के Internal Grievance Redressal तंत्र का उपयोग कर सकते हैं या Insurance Ombudsman के पास शिकायत दर्ज करा सकते हैं। हमेशा अपने इलाज के मेडिकल रिकॉर्ड्स संभालकर रखें, क्योंकि यह क्लेम चैलेंज करने में सबसे ज्यादा मददगार साबित होते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.