McKinsey की रिपोर्ट: AI में बैंकों का अरबों का निवेश बेकार! पुराने सिस्टम बन रहे हैं रोड़ा

BANKINGFINANCE
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AuthorAditi Chauhan|Published at:
McKinsey की रिपोर्ट: AI में बैंकों का अरबों का निवेश बेकार! पुराने सिस्टम बन रहे हैं रोड़ा
Overview

McKinsey & Company की एक नई रिपोर्ट ने बैंकिंग सेक्टर को बड़ा आईना दिखाया है। दुनिया भर के बैंक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर अरबों डॉलर खर्च कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अपेक्षित नतीजे नहीं मिल रहे। इसकी मुख्य वजह AI टेक्नोलॉजी की कमी नहीं, बल्कि बैंकों के अपने पुराने सिस्टम और अप्रोच हैं।

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AI से उम्मीदें क्यों नहीं हो रही पूरी?

McKinsey की रिपोर्ट के मुताबिक, बैंकों और AI के बीच यह फासला इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि वे पुराने सिस्टम और प्रक्रियाओं पर ही टिके हुए हैं। AI से होने वाली लागत में कमी और बेहतर ग्राहक अनुभव का वादा अक्सर पूरा नहीं हो पाता, क्योंकि AI को मौजूदा अक्षम सिस्टम के ऊपर ही लागू किया जा रहा है, बजाय इसके कि सिस्टम को ही नया बनाया जाए।

भारी निवेश, पर नतीजा शून्य

बैंक आवाज़ को समझने वाले बॉट्स (voice bots) और डेटा एनालिसिस जैसे AI टेक्नोलॉजी में भारी पैसा लगा रहे हैं। अनुमान है कि इससे लागत 30% से 45% तक कम हो सकती है। लेकिन, ये फायदे अक्सर नहीं मिलते। AI के नाकाम होने की सबसे बड़ी वजह यह है कि यह ग्राहक की समस्याओं की जड़ को ठीक करने के बजाय, मौजूदा गैर-कुशल प्रक्रियाओं को ऑटोमेट कर देता है। इसके अलावा, रेगुलेटरी और रिस्क से जुड़े नियम भी AI की असरदारिता को कम करते हैं। इंडस्ट्री के आंकड़े बताते हैं कि कुछ टेक्नोलॉजी-आगे वाले बैंक अपनी कमाई का 16.4% तक टेक्नोलॉजी पर खर्च करते हैं, लेकिन कई ऐसे हैं जो इस निवेश को नतीजों में नहीं बदल पा रहे।

लीगेसी सिस्टम IT बजट चूस रहे

असल समस्या बैंकों के लीगेसी सिस्टम (Legacy Systems) में है। रिपोर्ट बताती है कि बैंक अपने IT बजट का एक बड़ा हिस्सा, यानी 70% तक, सिर्फ पुराने सिस्टम को बनाए रखने में खर्च कर देते हैं। इससे इनोवेशन (innovation) के लिए कम पैसा बचता है। कुल IT खर्च, जो राजस्व (revenue) का 6% से 12% तक हो सकता है, अक्सर लीगेसी सिस्टम को जिंदा रखने में ही चला जाता है। बैंकों के मुख्य कोर बैंकिंग प्लेटफॉर्म 30 से 40 साल पुराने हो सकते हैं, जो नए प्रोडक्ट लॉन्च करने में देरी करते हैं और फुर्तीली फिनटेक (FinTech) कंपनियों की तुलना में पिछड़ा देते हैं। कई बैंक अभी भी COBOL-आधारित सिस्टम पर चल रहे हैं, जिनमें अरबों लाइनों का COBOL कोड है, जिसे बनाए रखना महंगा और मुश्किल होता जा रहा है।

AI प्रोजेक्ट्स में बढ़ती मुश्किलें

इस बीच, दुनिया भर में करीब 43% कंपनियां AI प्रोजेक्ट्स में संघर्ष कर रही हैं क्योंकि उनके पास स्पष्ट व्यावसायिक लक्ष्य और उचित डेटा प्रबंधन (data management) का अभाव है। ये पुराने सिस्टम आधुनिक सिस्टम की तुलना में अपडेट को धीमा कर देते हैं, जिसका सीधा असर इस बात पर पड़ता है कि बदलाव कितनी तेज़ी से किए जा सकते हैं।

कुछ न करने की भारी कीमत

जो बैंक इन सिस्टम को अपडेट नहीं करते, वे न सिर्फ मौके गंवा रहे हैं, बल्कि अप्रासंगिक (irrelevant) भी हो सकते हैं। पुराने सिस्टम को चलाने में ज़्यादा लागत आती है, वे कम सुरक्षित होते हैं और डिजिटल ज़रूरतों के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते। साल 2028 तक, जो बैंक आधुनिकीकरण (modernize) करने में नाकाम रहेंगे, वे $57 अरब से ज़्यादा का रेवेन्यू गंवा सकते हैं, जिसमें अकेले पेमेंट से होने वाली कमाई का बड़ा हिस्सा शामिल है। विलय (mergers) के ज़रिए सालों से बने ये सिस्टम बैंकों को ग्राहक की मांगों और नए नियमों के प्रति धीमा बना देते हैं। AI की दक्षता (efficiency) का वादा इन अस्थिर सिस्टम पर सीमित है। जो बैंक आधुनिक सिस्टम बना रहे हैं, उनके मुकाबले पुराने 'टेक्निकल डेट' (technical debt) वाले बैंकों को रखरखाव की बढ़ती लागत और सुरक्षा के ज़्यादा जोखिम का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, टेक कंपनियों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण AI टैलेंट की कमी भी एडवांस्ड AI प्रोजेक्ट्स में बाधा डाल रही है।

AI की असली ताकत को अनलॉक करने का तरीका

McKinsey का जोर है कि बैंकों को सिर्फ AI को 'ऊपर से लगाना' (overlay) नहीं चाहिए, बल्कि अपने कामकाज के तरीके में बुनियादी बदलाव लाना होगा। उन्हें अपने ऑपरेशन्स को पूरी तरह से रीडिज़ाइन (redesign) करने की ज़रूरत है। सफलता के लिए पुरानी संरचनाओं को तोड़ना होगा। इससे ग्राहक कॉल्स में 25-40% की कमी और संतुष्टि में बढ़ोतरी जैसे फायदे मिल सकते हैं। बैंकिंग का भविष्य AI को एक 'ट्रांसफॉर्मेटिव फोर्स' (transformative force) के रूप में देखने पर निर्भर करता है, जिसके लिए टैलेंट, टेक्नोलॉजी, डेटा और रिस्क मैनेजमेंट में पूरी तरह से बदलाव की ज़रूरत होगी।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.