Macquarie Capital का कहना है कि नियर-टर्म (near-term) के लिए नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) पर दांव लगाना पारंपरिक बैंकों पर दांव लगाने से बेहतर है। ब्रोकरेज फर्म का मानना है कि NBFCs मजबूत कमाई (earnings) और स्थिर मार्जिन (margins) दे रही हैं, वहीं बैंक मार्जिन दबाव और डिपॉजिट ग्रोथ में कमी से जूझ रहे हैं।
NBFCs की मजबूती का कारण
Macquarie Capital की फाइनेंशियल रिसर्च टीम, जिसके प्रमुख सुरेश गणेशन हैं, ने बैंकों के प्रति सावधानी भरा रवैया अपनाया है। टीम ने नियर-टर्म (near-term) के लिए NBFCs को प्राथमिकता देने का फैसला किया है। हाल की तिमाही की कमाई के नतीजों से यह बात निकल कर आई है कि जहां कई NBFCs ने अपने प्रॉफिट मार्जिन को स्थिर बनाए रखा, वहीं बैंकिंग सेक्टर को बढ़ती मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
रिसर्च से पता चलता है कि NBFCs ने कमाई के मामले में ज्यादा मजबूती दिखाई है, और कई कंपनियों ने मार्केट की उम्मीदों से बेहतर प्रदर्शन किया है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की तरफ से रेगुलेटरी बदलावों, जैसे कि रिवॉल्विंग क्रेडिट (revolving credit) पर नए दिशानिर्देशों के बावजूद, NBFCs से अपने मार्जिन को स्थिर रखने और ऑपरेटिंग कॉस्ट (operating costs) को कंट्रोल में रखने की उम्मीद है।
एनालिस्ट्स का कहना है कि NBFCs के पास अक्सर लोन की एक मजबूत पाइपलाइन और खर्चों पर लगाम होती है, इसलिए वे लगातार ग्रोथ के लिए अच्छी स्थिति में हैं। Macquarie ने खासतौर पर Shriram Finance और Aditya Birla Capital जैसी कंपनियों को अपनी पसंद बताया है, क्योंकि वे लगातार एसेट ग्रोथ (asset growth) को मैनेज करने और स्थिर कमाई बनाए रखने में सक्षम हैं, भले ही कुल लोन ग्रोथ में थोड़ी कमी आए।
बैंकिंग सेक्टर की चुनौतियां
इसके विपरीत, पारंपरिक बैंक काफी दबाव में हैं। सबसे बड़ी चुनौती मार्जिन पर लगातार पड़ रहा दबाव है, क्योंकि बैंकों के लिए लोन पर कमाए जाने वाले इंटरेस्ट और डिपॉजिट पर दिए जाने वाले इंटरेस्ट के बीच के अंतर को स्थिर रखना मुश्किल हो रहा है। डिपॉजिट की ऊंची लागत बैंकों के लिए पिछले अवधियों की तरह तेजी से लोन बुक बढ़ाना मुश्किल बना रही है।
उदाहरण के लिए, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) जैसे बड़े पब्लिक सेक्टर बैंकों में भी लोन ग्रोथ में नरमी देखी जा रही है। कई बैंकों के मैनेजमेंट को नए डिपॉजिट जुटाने में आ रही लगातार मुश्किलों को देखते हुए लोन ग्रोथ के अनुमानों को कम करना पड़ा है। बैंकिंग सेक्टर के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (Net Interest Margins), जो प्रॉफिटेबिलिटी का एक अहम पैमाना हैं, पिछले साल की तुलना में सिकुड़ गए हैं, जिससे निवेशक नियर-टर्म रिकवरी को लेकर सतर्क हैं।
सेक्टर की पसंद और रेगुलेटरी आउटलुक
फाइनेंशियल सेक्टर में, Macquarie अपनी कॉम्पिटिटिव पोजिशनिंग (competitive positioning) के आधार पर कुछ खास नामों को प्राथमिकता दे रही है। बड़े प्राइवेट बैंकों में ICICI Bank को पसंदीदा चुना गया है, जबकि छोटे प्राइवेट बैंकों में City Union Bank अभी भी पसंदीदा है। इंश्योरेंस सेक्टर में, सरकारी हिस्सेदारी की बिक्री और एम्बेडेड वैल्यू (embedded value) पर फोकस के बावजूद, कमीशन पर रेगुलेटरी कैप्स (regulatory caps) को लेकर चिंताओं के बावजूद, Life Insurance Corporation of India (LIC) को अपने प्रतिद्वंद्वियों से बेहतर विकल्प बताया गया है।
निवेशकों के लिए, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि RBI का रिवॉल्विंग क्रेडिट और लिक्विडिटी (liquidity) दिशानिर्देशों पर अंतिम रुख पूरे फाइनेंशियल सेक्टर को कैसे प्रभावित करता है। सप्लाई-चेन और इन्वेंट्री फाइनेंसिंग (inventory financing) को कैसे वर्गीकृत किया जाएगा, इसमें कोई भी संभावित बदलाव यह प्रभावित कर सकता है कि ये कंपनियां कितना क्रेडिट बढ़ा सकती हैं। इसके अतिरिक्त, बैंकों की डिपॉजिट लागत को कम करने और डिपॉजिट जुटाने की क्षमता यह निर्धारित करने में एक महत्वपूर्ण कारक होगी कि आने वाली तिमाहियों में मार्जिन का दबाव कम होना शुरू होता है या नहीं।
