माइक्रोफाइनेंस कंपनियों (MFIs) ने RBI से उधारकर्ताओं के लिए सालाना पारिवारिक आय की पात्रता सीमा को **₹3 लाख** से बढ़ाकर **₹4.5 लाख** करने का आग्रह किया है। महंगाई के असर को देखते हुए यह मांग की गई है, जबकि सेक्टर अभी भी लोन साइज बढ़ाने और डिजिटल ट्रांजैक्शन लागत जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है।
पात्रता सीमा में बदलाव की जरूरत
इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि पिछले पांच वर्षों से आय की सीमा स्थिर बनी हुई है, जबकि महंगाई ने आम आदमी की आर्थिक स्थिति को पूरी तरह बदल दिया है। इस बदलाव से माइक्रोफाइनेंस कंपनियों को अपनी पहुंच बढ़ाने में मदद मिलेगी। हालांकि, सेक्टर अभी एक कठिन दौर से गुजर रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2027 की पहली तिमाही के डेटा के अनुसार, इंडस्ट्री का कुल पोर्टफोलियो 7.6% घटकर ₹3.26 लाख करोड़ रह गया है। रेवेन्यू बनाए रखने के लिए कंपनियां अब बड़े लोन पर फोकस कर रही हैं, जिसके चलते नए लोन की औसत वैल्यू में 15% की बढ़ोतरी देखी गई है।
एसेट क्वालिटी और रिस्क
निवेशकों के लिए एसेट क्वालिटी एक मिश्रित संकेत दे रही है। अच्छी खबर यह है कि 30 से 89 दिन तक ओवरड्यू रहने वाले लोन (अर्ली-स्टेज डेलिंक्वेंशिस) 1.6% से गिरकर 0.8% पर आ गए हैं। हालांकि, पुरानी डिफ़ॉल्ट की समस्या अभी भी चिंता का विषय है। 180 दिन से अधिक पुराने बैड लोन का आंकड़ा 4.4% बढ़कर 17.4% पर पहुंच गया है, जो बैलेंस शीट पर दबाव बना रहा है।
फंडिंग और नई चुनौतियां
सेक्टर में फंडिंग का वितरण भी असमान है। पहली तिमाही में वितरित ₹17,706 करोड़ का 92% हिस्सा केवल बड़ी संस्थाओं को मिला है, जिससे छोटी कंपनियों के लिए पूंजी जुटाना चुनौतीपूर्ण हो गया है। फंडिंग का मुख्य स्रोत निजी बैंक बने हुए हैं, जिनका योगदान 56% है।
भविष्य की चुनौतियों पर बात करें तो, अक्टूबर 2026 से ₹2,000 से ज्यादा के UPI ट्रांजैक्शन पर 0.4% का मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे डिजिटल पेमेंट के जरिए लोन चुकाने वाले ग्राहकों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। अब निवेशकों की नजरें RBI के अंतिम फैसले और छोटी कंपनियों के फंडिंग डायवर्सिफिकेशन पर टिकी हैं।
