FY25 तक लाइफ इंश्योरेंस का प्रीमियम कलेक्शन **₹7.62 लाख करोड़** पहुंच गया है, लेकिन इकोनॉमिक आउटपुट के मुकाबले बीमा की पहुंच (Penetration) कम हो गई है। डेटा बताता है कि अब कंपनियां मास मार्केट की जगह हाई-वैल्यू पॉलिसीज पर ज्यादा फोकस कर रही हैं।
प्रीमियम बनाम पहुंच का अंतर
इंश्योरेंस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (IIB) के डेटा से पता चलता है कि पिछले 5 सालों में सालाना प्रीमियम कलेक्शन ₹5.44 लाख करोड़ से बढ़कर ₹7.62 लाख करोड़ हो गया है। हालांकि, ग्रॉस स्टेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट (GSDP) के मुकाबले बीमा का दायरा कम हुआ है। यह साफ संकेत है कि बीमा कारोबार तो बढ़ रहा है, लेकिन यह देश की आर्थिक वृद्धि दर के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहा है।
'प्रीमियम' पर कंपनियों का दांव
भले ही पॉलिसी की संख्या 34.94 करोड़ से घटकर 34.32 करोड़ रह गई हो, लेकिन कुल 'सम अश्योर्ड' (Sum Assured) ₹115.5 लाख करोड़ से उछलकर ₹168.46 लाख करोड़ पर पहुंच गया है। इससे स्पष्ट है कि बीमा कंपनियां अब कम ग्राहकों को महंगी पॉलिसी बेचने पर ध्यान दे रही हैं। यह 'प्रीमियम' स्ट्रैटेजी कंपनियों का टिकट साइज तो बढ़ा रही है, लेकिन आम आदमी तक पहुंच बनाने में चुनौती पेश कर रही है।
राज्यों का हाल और बड़े बदलाव
क्षेत्रीय आंकड़ों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल 3.11% के साथ बीमा पहुंच में सबसे आगे है, हालांकि यह पहले के 3.65% से नीचे आया है। वहीं, असम में सबसे बड़ी गिरावट देखी गई है, जहां पेनिट्रेशन 1.04% घटकर 2.49% रह गया है। दूसरी ओर, हरियाणा ₹8.83 लाख की औसत सम अश्योर्ड के साथ टॉप पर है, जबकि राष्ट्रीय औसत केवल ₹4.91 लाख है। दिल्ली, हरियाणा और मिजोरम जैसे इलाकों में हाई-वैल्यू पॉलिसीज का बोलबाला है।
निवेशकों के लिए बड़ी सीख
निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि क्या कंपनियां केवल हाई-नेट-वर्थ सेगमेंट पर ही टिकी रहेंगी या मास मार्केट में वॉल्यूम वापस लाने में सफल होंगी। आने वाले समय में कंपनियों के अर्निंग्स में यह देखना अहम होगा कि क्या यह हाई-टिकट रणनीति लंबी अवधि के लिए टिकाऊ है या नहीं।
