बड़ी भारतीय NBFCs अब अपने पोर्टफोलियो को सुरक्षित करने के लिए गोल्ड-बैक्ड लोन की तरफ तेजी से मुड़ रही हैं। जुलाई 2026 तक इस सेक्टर में **68.5%** की सालाना क्रेडिट ग्रोथ दर्ज की गई है। Tata Capital और Aditya Birla Capital जैसे बड़े खिलाड़ियों की आक्रामक एंट्री से बाजार में कॉम्पिटिशन बढ़ गया है, हालांकि जानकारों ने रेगुलेटरी और मार्केट रिस्क को लेकर आगाह भी किया है।
भारत के नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल सेक्टर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। बड़ी डायवर्सिफाइड लेंडिंग कंपनियां अब अनसिक्योर्ड क्रेडिट (Unsecured Credit) और माइक्रोफाइनेंस से हटकर गोल्ड लोन की ओर रुख कर रही हैं। जुलाई 2026 तक के आंकड़े बताते हैं कि गोल्ड लोन सेक्टर ने 68.5% की जबरदस्त सालाना ग्रोथ हासिल की है।
सुरक्षित लेंडिंग की तरफ झुकाव
NBFCs के लिए गोल्ड लोन एक सुरक्षित जरिया बन गया है क्योंकि सोना एक लिक्विड एसेट है और इसका वैल्यूएशन करना आसान है। Aditya Birla Capital, Tata Capital और L&T Finance जैसी दिग्गज कंपनियां अब अपने रिस्की पोर्टफोलियो को कम करने के लिए गोल्ड लोन को प्राथमिकता दे रही हैं। सोने की कीमतों में मजबूती के कारण ग्राहकों को भी ज्यादा लोन मिल रहे हैं, जिससे इस बिजनेस को और रफ्तार मिल रही है।
अधिग्रहण और ब्रांच विस्तार की होड़
इस सेक्टर में अब Muthoot Finance और Manappuram Finance जैसे पारंपरिक खिलाड़ियों को कड़ी टक्कर मिल रही है। नई कंपनियां तेजी से पैर पसारने के लिए अधिग्रहण का रास्ता अपना रही हैं। उदाहरण के तौर पर, Tata Capital को Yogakshemam Loans के अधिग्रहण की मंजूरी मिली है, वहीं Godrej Finance ने Kanakadurga Finance को खरीदकर अपनी पहुंच बढ़ाई है।
ऑर्गेनिक ग्रोथ की बात करें तो Aditya Birla Capital ने अगले तीन साल में 1,000 नई ब्रांच खोलने का लक्ष्य रखा है। वहीं Bajaj Finance ने इस फाइनेंशियल ईयर के अंत तक 2,800 ब्रांच तक पहुंचने की योजना बनाई है। उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2027 में नए खिलाड़ी बाजार में कुल 3,700 नई ब्रांच जोड़ेंगे।
जोखिम और रेगुलेटरी सख्ती
इतनी तेजी से बढ़ते विस्तार के साथ चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। नए खिलाड़ियों के आने से कॉम्पिटिशन बढ़ेगा, जिससे लेंडिंग यील्ड (Lending Yield) पर दबाव पड़ सकता है और कस्टमर एक्विजिशन कॉस्ट बढ़ सकती है। इसके अलावा, RBI भी इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर रखे हुए है। रेगुलेटर खास तौर पर LTV (Loan-to-Value) रेशियो, नीलामी की पारदर्शिता और थर्ड-पार्टी सोर्सिंग जैसे मुद्दों पर सख्त रुख अपनाए हुए है। भविष्य में निवेशकों को इस बात पर ध्यान देना होगा कि ये कंपनियां कैसे अपने ऑपरेशनल खर्चों को मैनेज करती हैं और गोल्ड की कीमतों में गिरावट की स्थिति में खुद को कैसे सुरक्षित रखती हैं।
