LIC Share Sale: ₹31,552 करोड़ की डील, बैंकों को मिले बस ₹4 लाख! जानिए क्या है पूरा मामला

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
LIC Share Sale: ₹31,552 करोड़ की डील, बैंकों को मिले बस ₹4 लाख! जानिए क्या है पूरा मामला

सरकार ने लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन (LIC) के **6.5%** शेयर बेचकर **₹31,552 करोड़** जुटाए हैं। लेकिन इस बंपर डील में खास बात यह है कि इसे मैनेज करने वाले चार बड़े इन्वेस्टमेंट बैंकों को कुल मिलाकर सिर्फ **₹4 लाख** का मामूली कमीशन मिला है।

रिकॉर्ड डील और मामूली फीस

भारत सरकार ने हाल ही में लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन (LIC) में अपनी 6.5% हिस्सेदारी बेचकर ₹31,552 करोड़ का एक बड़ा ऑफर फॉर सेल (OFS) सफलतापूर्वक पूरा किया। इस सेल का मुख्य उद्देश्य LIC के लिए मिनिमम पब्लिक शेयरहोल्डिंग नॉर्म्स (Minimum Public Shareholding Norms) को पूरा करना था। लेकिन इस मल्टी-बिलियन डॉलर की डील का सबसे ज्यादा चर्चा वाला पहलू यह है कि इसमें शामिल चार प्रमुख इन्वेस्टमेंट बैंकों को कितना भुगतान किया गया।

IIFL Capital Services, BNP Paribas Securities India, Goldman Sachs (India) Securities और Motilal Oswal Investment Advisors जैसे बड़े बैंकों ने इस ट्रांजैक्शन को मैनेज किया। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इन सभी फर्मों को मिलाकर कुल फीस के तौर पर सिर्फ ₹4 लाख मिलेंगे। यह राशि डील की कुल वैल्यू के मुकाबले न के बराबर है, जिसे 'लगभग शून्य' फीस की डील कहा जा रहा है। यह स्थिति तब बनी जब एक बैंक ने इस डील को मैनेज करने के लिए शून्य फीस की पेशकश की, जिसके दबाव में बाकी बैंकों को भी इसी तरह के टर्म्स पर आना पड़ा ताकि वे कॉम्पिटिशन में बने रह सकें और सरकार के बड़े प्रोजेक्ट्स को मैनेज करने का अनुभव हासिल कर सकें।

LIC के शेयर पर असर और मार्केट सेंटीमेंट

जब भी सरकार किसी बड़ी कंपनी में इतनी बड़ी हिस्सेदारी बेचती है, तो इसका सीधा असर स्टॉक पर पड़ता है। सरकारी बिक्री के लिए फ्लोर प्राइस (Floor Price) ₹382 तय किया गया था, जो उस समय बाजार भाव से कम था। इस वजह से LIC के शेयर की कीमत में गिरावट आई, क्योंकि मार्केट में अचानक सप्लाई बढ़ गई।

निवेशकों के लिए यह घटना दिखाती है कि बड़े सरकारी विनिवेश (Divestment) कैसे स्टॉक की लिक्विडिटी (Liquidity) और प्राइस वोलेटिलिटी (Price Volatility) को प्रभावित करते हैं। जब सरकार पब्लिक शेयरहोल्डिंग बढ़ाने के लिए बड़ी मात्रा में शेयर बेचती है, तो शॉर्ट टर्म में डिमांड से ज्यादा सप्लाई हो जाती है, जिससे शेयर की कीमतों में गिरावट आ सकती है।

फीस मॉडल की सस्टेनेबिलिटी पर सवाल

इस घटना ने मार्केट एनालिस्ट्स के बीच इस बात पर बहस छेड़ दी है कि क्या सरकारी प्रोजेक्ट्स के लिए 'जीरो-फी' या 'मिनिमल-फी' का यह ट्रेंड टिकाऊ है। भले ही ये बैंक ऐसे बड़े सरकारी सौदों से मिली अहमियत और अपने नेटवर्क का फायदा उठाते हों, लेकिन यह प्रैक्टिस इन्वेस्टमेंट बैंकिंग एडवाइजरी सेवाओं की लॉन्ग-टर्म प्रॉफिटेबिलिटी पर सवाल खड़े करती है। आलोचकों का कहना है कि इस तरह की आक्रामक प्राइसिंग से सेवाओं की क्वालिटी पर असर पड़ सकता है।

छोटे एडवाइजरी फर्मों के लिए, इस तरह की फीस स्ट्रक्चर एंट्री बैरियर (Entry Barrier) बन सकती है, क्योंकि उनके पास ऐसे सौदों में भाग लेने के लिए पर्याप्त पूंजी नहीं हो सकती है, जिनसे उन्हें कोई सीधा राजस्व (Revenue) न मिले। इन बैंकों का मुख्य लक्ष्य भविष्य में सरकार की और बड़ी विनिवेश योजनाओं में अपनी जगह बनाना हो सकता है, जहां वे बड़े और ज्यादा मुनाफे वाले सौदों से अपनी लागत वसूलने की उम्मीद कर सकते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.