भारत के तेजी से बढ़ते इंश्योरेंस सेक्टर में अब 'मिसबाइंग' (Misbuying) एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। लोग सस्ते प्रीमियम के चक्कर में ऐसी पॉलिसी चुन रहे हैं, जो जरूरत के समय काम नहीं आती। यह समस्या न केवल ग्राहकों के लिए, बल्कि सेक्टर की ग्रोथ और भरोसे के लिए भी बड़ा रिस्क है।
भारत के इंश्योरेंस सेक्टर में अब तक 'मिससेलिंग' (Misselling) पर चर्चा होती थी, जहां एजेंट अपनी मर्जी के प्रोडक्ट बेचते थे। लेकिन अब 'मिसबाइंग' (Misbuying) एक बड़ी मुसीबत है। इसमें ग्राहक खुद अपनी गलती से ऐसे इंश्योरेंस प्लान चुन लेते हैं, जो उनकी जरूरतों को पूरा नहीं करते। इसकी मुख्य वजह है—सिर्फ कम प्रीमियम पर फोकस करना।
'सस्ता' पड़ सकता है महंगा
बाजार में कंपनियों के बीच चल रही होड़ में अक्सर 'रेस टू द बॉटम' (Race to the bottom) वाली स्थिति बन जाती है। ग्राहक सबसे सस्ता प्रीमियम देख लेते हैं, लेकिन इसके पीछे छिपी शर्तों, कम कवरेज या 'हिडन एक्सक्लूजन' (Hidden exclusions) को नजरअंदाज कर देते हैं। नतीजा यह होता है कि जब क्लेम (Claim) का वक्त आता है, तो पॉलिसी बेकार साबित होती है, जिसे इंडस्ट्री में 'प्रोटेक्शन गैप' (Protection gap) कहा जाता है।
कंपनियों और निवेशकों के लिए चेतावनी
यह सिर्फ ग्राहकों के लिए ही नहीं, बल्कि बिजनेस के लिए भी खतरनाक है। अगर किसी कंपनी के पास सही कवरेज नहीं है, तो एक बड़ा हादसा उसे दिवालिया (Insolvency) तक ले जा सकता है। वहीं, बार-बार क्लेम रिजेक्ट होने से इंश्योरेंस कंपनियों के प्रति ग्राहकों का भरोसा कम होता है, जो भविष्य की ग्रोथ के लिए बुरा संकेत है।
निवेशकों को अब सिर्फ 'वॉल्यूम ग्रोथ' (Volume growth) या प्रीमियम कलेक्शन के आंकड़ों को ही नहीं देखना चाहिए। भविष्य में वही कंपनियां बेहतर प्रदर्शन करेंगी जो पारदर्शी प्रोडक्ट बना रही हैं और ग्राहकों को उनके रिस्क प्रोफाइल के हिसाब से सही सलाह दे रही हैं।
IRDAI की नजर
अब रेगुलेटर IRDAI भी इन ढांचागत समस्याओं पर सख्त हो रहा है। उम्मीद है कि भविष्य में रिफॉर्म्स के जरिए नियमों को और पारदर्शी बनाया जाएगा, ताकि इंश्योरेंस कंपनियां केवल 'पॉलिसी बेचने वाली मशीन' न बनकर सही 'रिस्क एडवाइजर' (Risk advisor) के तौर पर काम करें।
