Institutional Tokenisation: बाज़ार में आया नया बूम, $30 अरब का आंकड़ा पार!

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AuthorAditya Rao|Published at:
Institutional Tokenisation: बाज़ार में आया नया बूम, $30 अरब का आंकड़ा पार!

दुनिया भर के बड़े फाइनेंसियल इंस्टीट्यूशन्स ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी को अपने कोर सिस्टम में इंटीग्रेट कर रहे हैं। 2026 के मध्य तक, टोकनाइज्ड रियल-वर्ल्ड एसेट्स (Real-World Assets) का वैल्यू **$30 बिलियन** को पार कर चुका है। यह कदम सेटलमेंट स्पीड और एसेट एक्सेसिबिलिटी को बेहतर बनाने का लक्ष्य रखता है। भारतीय निवेशकों के लिए यह डेवलपमेंट बहुत अहम है, क्योंकि SEBI और RBI जैसे रेगुलेटर्स ऑन-चेन सेटलमेंट और डिजिटल करेंसी के इस्तेमाल का टेस्ट कर रहे हैं।

बाज़ार का स्ट्रक्चर बदल रहा है?

ग्लोबल फाइनेंसियल मार्केट में एक बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव देखने को मिल रहा है। बड़े इंस्टीट्यूशन्स अब ब्लॉकचेन को सिर्फ एक्सपेरिमेंटल प्रोजेक्ट्स से आगे बढ़ाकर अपने कोर ऑपरेशंस में शामिल कर रहे हैं। 2026 के मध्य तक, टोकनाइज्ड रियल-वर्ल्ड एसेट्स, जैसे सरकारी ट्रेजरी, प्राइवेट क्रेडिट, कमोडिटी और इक्विटी, का कुल वैल्यू $30 बिलियन से ज़्यादा हो गया है। यह दिखाता है कि ब्लॉकचेन अब सिर्फ स्पेकुलेटिव टूल नहीं, बल्कि एसेट इश्यूएंस, कस्टडी और सेटलमेंट के लिए एक जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर बनता जा रहा है।

कौन-कौन हैं इस रेस में?

BlackRock और Franklin Templeton जैसे बड़े एसेट मैनेजर्स ने ऑन-चेन फंड्स लॉन्च किए हैं। वहीं, Depository Trust & Clearing Corporation (DTCC) जैसे मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइडर्स कस्टोडियल एसेट्स को ब्लॉकचेन पर ले जाने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। इस अडॉप्शन के पीछे का मुख्य कारण प्रैक्टिकल है। पारंपरिक फाइनेंसियल सिस्टम अक्सर T+1 या T+2 सेटलमेंट साइकिल पर निर्भर करते हैं, जिसमें कई इंटरमीडियरीज शामिल होते हैं। टोकनाइजेशन तेज, प्रोग्रामेबल सेटलमेंट, हाई-वैल्यू एसेट्स के फ्रैक्शनल ओनरशिप और स्टैंडर्ड एक्सचेंज आवर्स के बजाय कंटीन्यूअस ट्रेडिंग की सुविधा देता है।

चुनौतियां और रिस्क

फायदे साफ हैं, लेकिन मौजूदा मार्केट स्ट्रक्चर अभी भी ट्रांजिशन फेज में है। निवेशकों के लिए एक बड़ी चुनौती यह है कि इन एसेट्स का कुल वैल्यू तो बढ़ रहा है, लेकिन कई टोकनाइज्ड प्रोडक्ट्स के लिए ट्रेडिंग लिक्विडिटी अभी भी सीमित है। ये एसेट्स फिलहाल पब्लिक के लिए उपलब्ध हाई-लिक्विड इंस्ट्रूमेंट्स के बजाय इंस्टीट्यूशनल होल्डर्स के लिए डिजिटल रिसीट के तौर पर काम कर रहे हैं। इसके अलावा, ब्लॉकचेन में स्विच करने से साइबर सिक्योरिटी वल्नरेबिलिटीज और क्रॉस-बॉर्डर एसेट ट्रांसफर को संभालने वाले स्टैंडर्डाइज्ड ग्लोबल रेगुलेटरी फ्रेमवर्क की कमी जैसे रिस्क भी सामने आते हैं।

भारत का रेगुलेटरी प्लान

भारतीय निवेशकों के लिए टोकनाइजेशन की प्रगति डोमेस्टिक रेगुलेटरी डेवलपमेंट से गहराई से जुड़ी हुई है। जहां कुछ ग्लोबल ज्यूरिसडिक्शन ने अधिक लीनियंट अप्रोच अपनाया है, वहीं भारतीय रेगुलेटर्स एक डुअल स्ट्रेटेजी पर चल रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) एसेट सेटलमेंट के लिए होलसेल डिजिटल रुपए के एप्लीकेशन्स पर फोकस कर रहा है, जबकि सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) T+0 सेटलमेंट के लक्ष्य के साथ कॉर्पोरेट डेट टोकनाइजेशन का पायलट टेस्ट कर रहा है। इसके अलावा, एसेट टोकनाइजेशन (रेगुलेशन) बिल 2026 का डेवलपमेंट और GIFT सिटी IFSCA में स्थापित रेगुलेटरी सैंडबॉक्स इन टेक्नोलॉजीज के लोकल मार्केट में एंट्री के लिए एक स्ट्रक्चर्ड रास्ता प्रदान करते हैं।

आगे क्या?

आने वाले क्वार्टर्स में निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण मॉनिटर करने योग्य बात सेकेंडरी मार्केट की डेप्थ का डेवलपमेंट और प्रस्तावित 2026 के लेजिस्लेशन द्वारा प्रदान की जाने वाली रेगुलेटरी क्लैरिटी होगी। जैसे-जैसे भारतीय रेगुलेटर्स इनोवेशन की जरूरत और स्ट्रिक्ट मार्केट इंटीग्रिटी व टैक्स कंप्लायंस को संतुलित करेंगे, एक सुरक्षित, कंप्लायंट और लिक्विड ऑन-चेन इकोसिस्टम बनाने की क्षमता यह तय करेगी कि टोकनाइजेशन फाइनेंसियल सिस्टम का एक स्टैंडर्ड पार्ट बनता है या फिर एक निश इंस्टीट्यूशनल टूल बनकर रह जाता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.