बड़े इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स जैसे पेंशन फंड और इंश्योरेंस कंपनियां अब भारत के प्राइवेट क्रेडिट सेक्टर की ओर रुख कर रही हैं। इस सेक्टर में अब निवेश का अवसर **₹1 लाख करोड़** तक पहुंच गया है, हालांकि इसमें लिक्विडिटी और क्रेडिट रिस्क का जोखिम भी बना हुआ है।
भारत में बड़े इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स का नजरिया बदल रहा है। अब ये निवेशक इक्विटी और वेंचर कैपिटल की उठापटक से दूर, सुरक्षित और स्थिर कमाई (Income) के लिए प्राइवेट क्रेडिट का रुख कर रहे हैं। 2026 के अंत तक, इस सेगमेंट में सालाना निवेश का मौका ₹1 लाख करोड़ तक पहुंच चुका है, जो भारतीय फाइनेंशियल मार्केट की बदलती तस्वीर को बयां करता है।
बढ़ता हुआ संस्थागत भरोसा
प्रोफेशनल मनी मैनेजर्स अब अपने पुराने तौर-तरीकों से आगे बढ़ रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, Neo Alternative Asset Managers के दूसरे स्पेशल क्रेडिट फंड में संस्थागत पूंजी का योगदान बढ़कर 22% से 25% हो गया है, जबकि पहले फंड में यह आंकड़ा मात्र 1% से 2% था। वहीं, Ascertis Credit ने भी अक्टूबर 2026 तक $700 मिलियन से अधिक की कमिटमेंट्स के साथ अपना चौथा फंड क्लोज किया है। यह साफ दिखाता है कि निवेशक उन कंपनियों को पैसा दे रहे हैं जिनके पास कैश फ्लो की स्थिति मजबूत है।
बाजार का दायरा और रियल एस्टेट का दबदबा
प्राइवेट क्रेडिट मार्केट में घरेलू भागीदारी तेजी से बढ़ी है, जो कुल डील वैल्यू का लगभग 75% हिस्सा संभाल रही है। इसमें रियल एस्टेट सेक्टर सबसे आगे है, जो कुल डील वैल्यू का 35% हिस्सा कवर करता है। बैंक फाइनेंसिंग में मुश्किलों के चलते डेवलपर्स अब तेजी से प्राइवेट क्रेडिट का सहारा ले रहे हैं।
निवेश से पहले रिस्क को समझें
हालांकि प्राइवेट क्रेडिट में ज्यादा यील्ड (Yield) मिलने की उम्मीद होती है, लेकिन इसमें कुछ गहरे जोखिम भी हैं। सबसे बड़ा रिस्क 'लिक्विडिटी' का है—ये निवेश लिस्टेड शेयरों की तरह नहीं होते, जिन्हें आप एक बटन दबाकर बेच सकें। इसके अलावा, क्रेडिट रिस्क भी ज्यादा है, क्योंकि ये फंड ऐसी कंपनियों को लोन देते हैं जो बैंक लोन पाने की पात्रता नहीं रखतीं। साथ ही, Reserve Bank of India (RBI) के बदलते रेगुलेटरी नियम भी इस सेक्टर की पारदर्शिता और वर्किंग पर असर डाल सकते हैं। निवेशकों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनकी पूंजी कितनी सुरक्षित है, यह फंड मैनेजर की क्रेडिट असेसमेंट क्षमता पर निर्भर करता है।
