Financial Appellate Tribunal: क्या देश में बनेगा एक 'यूनिफाइड' ट्रिब्यूनल? रेगुलेटरी विवादों पर छिड़ी नई बहस

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AuthorAditya Rao|Published at:
Financial Appellate Tribunal: क्या देश में बनेगा एक 'यूनिफाइड' ट्रिब्यूनल? रेगुलेटरी विवादों पर छिड़ी नई बहस

फाइनेंशियल सेक्टर में विवादों के निपटारे के लिए एक कॉमन 'यूनिफाइड फाइनेंशियल सेक्टर अपीलेट ट्रिब्यूनल' (FSAT) बनाने की चर्चा फिर से तेज हो गई है। एक्सपर्ट्स अब यह परख रहे हैं कि क्या RBI और अन्य रेगुलेटर्स की मौजूदा पावर के बीच एक निष्पक्ष अपीलेट बॉडी का होना जरूरी है?

भारत के फाइनेंशियल सेक्टर में एक यूनिफाइड फाइनेंशियल सेक्टर अपीलेट ट्रिब्यूनल (FSAT) के गठन का प्रस्ताव फिर से चर्चा के केंद्र में है। हालांकि यह कॉन्सेप्ट करीब एक दशक पुराने 'फाइनेंशियल सेक्टर लेजिस्लेटिव रिफॉर्म्स कमीशन' (FSLRC) की सिफारिशों से आया है, लेकिन फिलहाल सरकारी स्तर पर कोई ठोस लेजिस्लेटिव कदम नहीं उठाया गया है। चर्चा का मुख्य केंद्र रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा पेनल्टी लगाने की मौजूदा प्रक्रिया है।

क्यों उठ रही है ट्रिब्यूनल की मांग?

वर्तमान व्यवस्था में, जब RBI किसी फाइनेंशियल संस्थान पर कार्रवाई करता है, तो उनके पास अपील के लिए सीमित विकल्प होते हैं। अक्सर यह प्रक्रिया इंटरनल चैनलों या अदालतों तक ही सीमित रहती है। आलोचकों का मानना है कि एक स्वतंत्र ट्रिब्यूनल होने से रेगुलेटर और एडजुडिकेटर की भूमिका अलग-अलग हो जाएगी, जिससे न्याय प्रक्रिया में अधिक निष्पक्षता आएगी।

अधिकार क्षेत्र का टकराव (Jurisdictional Overlap)

इस ट्रिब्यूनल के गठन की राह में सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग रेगुलेटर्स के बीच तालमेल की है। भारत में RBI, SEBI और IRDAI जैसे रेगुलेटर्स अपने-अपने डोमेन में काम करते हैं। बैंकिंग, कैपिटल मार्केट्स और इंश्योरेंस सेक्टर की जटिलताओं को देखते हुए एक कॉमन ट्रिब्यूनल का गठन कानूनी रूप से चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।

निवेशकों और संस्थानों के लिए मायने

इन्वेस्टर्स और मार्केट प्लेयर्स के लिए यह बहस लॉन्ग-टर्म ऑपरेशनल रिस्क और कंप्लायंस से जुड़ी है। जैसे-जैसे फाइनेंशियल कंपनियां बड़ी और कॉम्प्लेक्स हो रही हैं, उनके लिए हर रेगुलेटर की अलग-अलग गाइडलाइन्स का पालन करना मुश्किल हो रहा है। समर्थकों का तर्क है कि FSAT मॉडल इस बोझ को कम कर सकता है, जबकि विरोधियों का कहना है कि मौजूदा नियम-आधारित ढांचा ही मार्केट की अखंडता बनाए रखने के लिए सबसे सही है।

फिलहाल, अगस्त 2026 तक स्थिति स्पष्ट है कि सरकार की ओर से ऐसा कोई ड्राफ्ट तैयार नहीं है। यह बहस अभी केवल हाई-लेवल बैंकिंग रिफॉर्म कमेटियों और इंडस्ट्री फोरम तक ही सीमित है, जहां यह तय किया जा रहा है कि क्या मौजूदा मल्टी-रेगुलेटर मॉडल ही वित्तीय स्थिरता के लिए सबसे अच्छा है या बदलाव की जरूरत है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.