Microfinance Sector: ₹3.81 लाख करोड़ का कर्ज संकट, क्लाइमेट चेंज से बढ़ रहा रिस्क

BANKINGFINANCE
Whalesbook Logo
AuthorNeha Patil|Published at:
Microfinance Sector: ₹3.81 लाख करोड़ का कर्ज संकट, क्लाइमेट चेंज से बढ़ रहा रिस्क

भारत का माइक्रोफाइनेंस सेक्टर अब क्लाइमेट चेंज (Climate Change) की मार झेल रहा है। कृषि पर निर्भरता के कारण पोर्टफोलियो एट रिस्क (PAR) बढ़कर **6.2%** हो गया है, जिससे निवेशकों की चिंताएं बढ़ गई हैं।

भारत का माइक्रोफाइनेंस सेक्टर, जो कुल ₹3.81 लाख करोड़ का पोर्टफोलियो संभालता है, अब एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि ट्रेडिशनल क्रेडिट असेसमेंट के तरीके अब क्लाइमेट चेंज के खतरों को भांपने में नाकाफी साबित हो रहे हैं, जिसका सीधा असर छोटे कर्जदारों की चुकाने की क्षमता पर पड़ रहा है।

खेती पर निर्भरता का असर

यह सेक्टर इसलिए भी ज्यादा रिस्की है क्योंकि इसका करीब 60% लोन पोर्टफोलियो कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों से जुड़ा है। जब भी बाढ़, भीषण गर्मी या सूखे जैसे हालात बनते हैं, तो किसानों और छोटे व्यापारियों की कमाई पर ब्रेक लग जाता है, जिसका सीधा असर लोन रिपेमेंट पर दिखता है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, सेक्टर का पोर्टफोलियो एट रिस्क (PAR)—जो ओवरड्यू लोन का पैमाना है—FY24 के 2.1% से उछलकर FY25 में 6.2% पर पहुंच गया है। यह साफ संकेत है कि क्लाइमेट रिस्क अब कोई भविष्य का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान वित्तीय प्रदर्शन का हिस्सा बन चुका है।

RBI की सख्ती और नई दिशा

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने नवंबर 2025 में नई गाइडलाइंस जारी की हैं, जिसमें NBFCs को क्लाइमेट रिस्क को अपने रिस्क मैनेजमेंट फ्रेमवर्क में शामिल करने को कहा गया है। अब तक कंपनियां इन घटनाओं को 'नेचुरल कैलेमिटी' (प्राकृतिक आपदा) मानती थीं, लेकिन अब इसे एक सिस्टमिक रिस्क की तरह ट्रैक करना अनिवार्य होगा। पूर्वी भारत, जहां देश के कुल लोन का 33% हिस्सा है और जो अक्सर खराब मौसम की मार झेलता है, वहां के लिए यह बदलाव सबसे ज्यादा मायने रखता है।

निवेशकों के लिए क्या है संकेत?

इन्वेस्टर्स और स्टेकहोल्डर्स के लिए अब माइक्रोफाइनेंस कंपनियों को आंकने का तरीका बदल रहा है। रेटिंग एजेंसियां अब क्रेडिट असेसमेंट में क्लाइमेट वल्नेरेबिलिटी (Climate Vulnerability) को जोड़ रही हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि रिस्की जोन में काम करने वाली कंपनियों की फंडिंग लागत (Borrowing Cost) बढ़ सकती है, जबकि बेहतर डेटा मैनेजमेंट करने वाली कंपनियां सस्ती पूंजी जुटा सकेंगी। आने वाले समय में निवेशकों की नजर इस पर होगी कि कंपनियां 'डिजिटल और डेटा-बैकड रिस्क असेसमेंट' को कितनी तेजी से अपनाती हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.