"मिसिंग मिडल" - वर्किंग कैपिटल की भारी कमी
NITI Aayog की रिपोर्ट से यह बात साफ तौर पर सामने आई है कि भारत में सिर्फ 4.3% महिला-स्वामित्व वाले उद्यमों को ही कैश क्रेडिट या ओवरड्राफ्ट जैसी ज़रूरी वर्किंग कैपिटल की सुविधा मिल पाती है। यह भारत के क्रेडिट सिस्टम में एक बड़े 'मिसिंग मिडल' (Missing Middle) की ओर इशारा करता है। यह एक बड़ी बाधा है जो कई महिला-नेतृत्व वाले बिज़नेस को आगे बढ़ने और टिके रहने के लिए आवश्यक वर्किंग कैपिटल हासिल करने से रोक रही है, भले ही उन्हें छोटे लोन आसानी से मिल रहे हों।
उधारदाताओं की चिंताएं और संरचनात्मक अड़चनें
Paisabazaar के CEO, संतोष अग्रवाल (Santosh Agarwal) के अनुसार, उधारदाता (Lenders) अक्सर ऐसे बिज़नेस प्रोफाइल को प्राथमिकता देते हैं जिनकी भविष्य की कमाई का अंदाज़ा लगाना आसान हो। वहीं, सेल्फ-एम्प्लॉयड उधारकर्ता (Self-employed borrowers), जिनमें कई महिला उद्यमी शामिल हैं, अक्सर अस्थिर कैश फ्लो, मौसमी कमाई, अनौपचारिक क्रेडिट हिस्ट्री और बिखरे हुए बैंकिंग रिकॉर्ड जैसी समस्याओं से जूझते हैं। BankBazaar.com के CEO, अधिल शेट्टी (Adhil Shetty) बताते हैं कि कैश क्रेडिट और ओवरड्राफ्ट का मूल्यांकन लगातार बिज़नेस परफॉरमेंस के आधार पर किया जाता है, जिसके लिए ऑडिटेड फाइनेंशियल (Audited Financials), GST ट्रेल्स और कोलैटरल (Collateral) की ज़रूरत होती है।
महिला-नेतृत्व वाले व्यवसायों की खास चुनौतियाँ
कई महिला-आधारित व्यवसायों, खासकर छोटे या घर से चलने वाले ऑपरेशन्स के लिए, इन कड़े पैमानों को पूरा करना मुश्किल होता है। बैंक आम तौर पर कोलैटरल और GST टर्नओवर को क्रेडिट योग्यता (Creditworthiness) के संकेतक के रूप में देखते हैं। लेकिन, Jupiter Meta Labs की सह-संस्थापक, मनसा राजन (Manasa Rajan) का कहना है कि महिला उद्यमी अक्सर प्रॉपर्टी लीज पर लेती हैं, मुनाफे को अनौपचारिक तरीके से फिर से निवेश करती हैं, या घर से ही बिज़नेस चलाती हैं। यह स्ट्रक्चर पारंपरिक कोलैटरल-आधारित उधार में उन्हें नुकसान पहुंचाता है। Mega Corporation Limited की EVP और बिज़नेस हेड, लवनीना कंसल (Loveena Kansal) ने इस मुद्दे को केवल क्रेडिट की कमी नहीं, बल्कि सही क्रेडिट स्ट्रक्चर तक पहुँच की कमी बताया।
डिजिटल लेंडिंग: उम्मीदें बनाम हकीकत
हालांकि डिजिटल लेंडिंग (Digital Lending) मॉडल्स ई-सिग्नेचर, ई-केवाईसी (e-KYC) और डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम के ज़रिए क्रेडिट योग्यता का आकलन करने के वैकल्पिक तरीके ला रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि ये बड़ी ज़रूरतें के लिए पूरी तरह से समाधान नहीं हैं। अधिल शेट्टी (Adhil Shetty) ने कहा कि बैंक स्टेटमेंट और GST फाइलिंग का उपयोग करके कैश-फ्लो-आधारित अंडरराइटिंग (Cash-flow-based underwriting) की ओर बदलाव आ रहा है, जिससे पहुँच में सुधार हो सकता है। हालांकि, मनसा राजन (Manasa Rajan) और IndiaP2P की सह-संस्थापक, नेहा जुनेजा (Neha Juneja) ने इस बात पर प्रकाश डाला कि ये डिजिटल ट्रेल्स अभी तक बड़े अमाउंट (larger ticket sizes) के लिए मुख्यधारा की अंडरराइटिंग में व्यवस्थित रूप से एकीकृत नहीं हुए हैं।
बेहतर वित्तीय पहुँच के रास्ते
पहुँच को बेहतर बनाने के लिए संरचनात्मक सुधार (Structural Reform) की ज़रूरत है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि वर्किंग-कैपिटल उत्पादों के लिए विशेष क्रेडिट गारंटी का विस्तार करना और कैश-फ्लो-आधारित अंडरराइटिंग को औपचारिक रूप से पहचानना महत्वपूर्ण कदम हैं। लवनीना कंसल (Loveena Kansal) महिला उद्यमियों की वास्तविकताओं के अनुरूप, 'फिट-फॉर-पर्पस' (Fit-for-purpose) क्रेडिट डिजाइन तैयार करने की वकालत करती हैं, उनका मानना है कि उनकी क्रेडिट योग्यता अक्सर मजबूत होती है, लेकिन उन्हें उपयुक्त वित्तीय उत्पाद नहीं मिलते। डेटा की पारदर्शिता और सार्वजनिक रिपोर्टिंग में वृद्धि से उधार देने वाले इकोसिस्टम में अधिक जवाबदेही को बढ़ावा मिल सकता है।
