India's Lost Billions & Green Bonds: अनक्लेम्ड पैसा ₹60,000 करोड़ पार, ग्रीन बॉन्ड की कीमत पर सवाल!

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AuthorMehul Desai|Published at:
India's Lost Billions & Green Bonds: अनक्लेम्ड पैसा ₹60,000 करोड़ पार, ग्रीन बॉन्ड की कीमत पर सवाल!
Overview

भारत का वित्तीय सिस्टम इस वक्त एक दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है। एक तरफ, बैंकों में लावारिस पड़ी जमा राशि (Unclaimed Deposits) जनवरी 2026 तक **₹60,518 करोड़** के पार पहुंच गई है, वहीं दूसरी ओर, देश के सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड (Sovereign Green Bonds) को लेकर कीमतों का पेंच फंसता दिख रहा है।

बढ़ता लावारिस खजाना: क्या इन्हें वापस पाएं?

देश के पब्लिक सेक्टर बैंकों में जनवरी 2026 तक ₹60,518 करोड़ की रकम लावारिस पड़ी है, जो सीधे रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के डिपॉजिटर एजुकेशन एंड अवेयरनेस (DEA) फंड में जाती है। सभी बैंकों को मिलाकर यह आंकड़ा ₹72,454 करोड़ तक पहुंच गया है। सिर्फ बैंकिंग सेक्टर ही नहीं, इंश्योरेंस (Insurance) की दुनिया में भी फरवरी के अंत तक ₹8,973.89 करोड़ के क्लेम अनक्लेम्ड थे, और म्यूचुअल फंड (Mutual Funds) में निवेशकों के ₹3,749.34 करोड़ फंसे हुए हैं। सालों से जमा ये रकम भूले-बिसरे निवेशों का नतीजा है। मार्च 2024 तक लाइफ इंश्योरर्स के पास ₹20,062 करोड़ और FY24-25 में म्यूचुअल फंड्स में ₹3,452 करोड़ का डिविडेंड (Dividend) और रिडेम्पशन (Redemption) अनक्लेम्ड रहा।

रेगुलेटर्स की कोशिशें कितनी कामयाब?

इन पैसों को वापस दिलाने के लिए रेगुलेटर्स (Regulators) ज़ोर-शोर से लगे हैं। 'आपका पैसा, आपका हक' (Your Money, Your Right) जैसे अभियानों से अक्टूबर से दिसंबर 2025 के बीच करीब 23 लाख क्लेमेंट को फरवरी 2026 तक ₹5,777 करोड़ लौटाए गए। RBI का UDGAM पोर्टल, IRDAI का Bima Bharosa, और SEBI का MITRA जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को खोजना आसान बना रहे हैं। साथ ही, बैंकिंग लॉज़ (अमेंडमेंट) एक्ट, 2025 ने नॉमिनेशन (Nomination) के ज़्यादा विकल्प देकर क्लेम सेटलमेंट में मदद की है। इसके बावजूद, अनक्लेम्ड फंड्स का बढ़ना जारी है। इसकी मुख्य वजहें हैं - कॉन्टैक्ट डिटेल्स का पुराना होना, खातों में नॉमिनेशन न होना और निवेशकों की तरफ से सुस्ती।

ग्रीन बॉन्ड: निवेशकों का इंटरेस्ट, पर कीमत पर असमंजस

जहां एक ओर ये पैसे फंसे हुए हैं, वहीं दूसरी ओर भारत के सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड (SGrB) प्रोग्राम में निवेशकों का लगातार इंटरेस्ट बना हुआ है। FY 2022-23 से शुरू होने के बाद से, एवरेज बिड-कवर रेशियो (Bid-Cover Ratio) 2 से ऊपर रहा है, जो FY 2025-26 में 2.32 तक पहुंचा। यह लगातार मांग को दर्शाता है। एक खास बात 'ग्रीनियम' (Greenium) है, यानी बॉन्ड की पर्यावरण-अनुकूल पहचान के लिए निवेशक जो प्रीमियम देते हैं। नवंबर 2025 के एक ऑक्शन में SGrBs ने 7 बेसिस पॉइंट का ग्रीनियम हासिल किया।

कीमत का पेंच: क्यों हो रहे ऑक्शन कैंसिल?

मगर, इस पॉजिटिव इंटरेस्ट के बावजूद बॉन्ड की कीमत तय करने में दिक्कतें आ रही हैं। हाल के SGrB ऑक्शन इसलिए रद्द करने पड़े क्योंकि निवेशक ऐसे यील्ड (Yield) की मांग कर रहे थे जो RBI को मंजूर नहीं थे। यह दिखाता है कि ग्रीनियम तो है, पर यह अस्थिर और लगातार नहीं है, खासकर अनिश्चित आर्थिक समय में। निवेशक सिर्फ 'ग्रीन' लेबल के लिए कम यील्ड स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर, जून 2025 में 30-साल के SGrB का ऑक्शन RBI ने रद्द कर दिया, जबकि ऑफर साइज़ ओवरसब्सक्राइब (Oversubscribe) हो गया था। यह यील्ड की मांगों के प्रति संवेदनशीलता को उजागर करता है।

सरकार का रुख और आगे की राह

वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी के अनुसार, SGrB निवेशकों के लिए किसी भी टैक्स इंसेटिव (Tax Incentive) की कोई योजना नहीं है। सरकार फिस्कल डिसिप्लिन (Fiscal Discipline) पर ज़ोर दे रही है और चाहती है कि ये बॉन्ड क्लाइमेट-फ्रेंडली प्रोजेक्ट्स को फंड करें, न कि टैक्स छूट से मांग बढ़ाई जाए। यह एक ग्लोबल ट्रेंड के अनुरूप है जहां ग्रीनियम घट रहा है, जो एक मैच्योरिंग मार्केट का संकेत है। SGrB मार्केट में अभी भी सॉवरेन इश्यूज़ (Sovereign Issues) का दबदबा है, जो सरकार की केंद्रीय भूमिका को बताता है।

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