भारत में छोटे व्यवसायों के लिए क्रेडिट पोर्टफोलियो में **14.9%** की सालाना बढ़ोतरी दर्ज की गई है। जून 2026 तक यह आंकड़ा **₹50.9 लाख करोड़** तक पहुंच गया है, हालांकि रिस्क फैक्टर और RBI के नए नियमों पर निवेशकों की नजरें टिकी हैं।
भारत के छोटे व्यवसायों के लिए कर्ज की उपलब्धता में साल 2026 की पहली छमाही में बड़ी हलचल देखी गई है। 14.9% की सालाना ग्रोथ के साथ, कुल बकाया कर्ज का आंकड़ा ₹50.9 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। यह डेटा दिखाता है कि छोटे उद्यम अपने ऑपरेशन और विस्तार के लिए फॉर्मल क्रेडिट पर कितनी गहराई से निर्भर हैं।
सोल प्रोपराइटरशिप (Sole Proprietorship) का दबदबा
इस ग्रोथ के पीछे सबसे बड़ी ताकत सोल प्रोपराइटर यानी अकेले कारोबार चलाने वाले उद्यमी हैं। इनके क्रेडिट पोर्टफोलियो में साल-दर-साल 19.3% की उछाल आई है, जबकि एक्टिव लोन की संख्या में 27.4% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर इस पूरे क्रेडिट पाई का 41.92% हिस्सा संभाल रहा है, जो छोटे स्तर पर पूंजी की भारी मांग को दर्शाता है।
एसेट क्वालिटी और उभरते रिस्क
ऊपरी तौर पर आंकड़े अच्छे लग रहे हैं और PAR (Past Due) रेशियो पिछले साल के 1.5% से घटकर 1.2% पर आ गया है, लेकिन हकीकत थोड़ी जटिल है। सोल प्रोपराइटरशिप के सेगमेंट में 'वेरी हाई रिस्क' एक्सपोजर 20% तक बढ़ गया है, जो दो साल पहले 17.4% था। यह इस बात का संकेत है कि कर्ज का बोझ कुछ छोटे उधारकर्ताओं के लिए चुनौतीपूर्ण हो रहा है, जिसके चलते कई फिनटेक लेंडर्स अब अपने अंडरराइटिंग स्टैंडर्ड्स सख्त कर रहे हैं।
रेगुलेटरी और इकोनॉमिक चुनौतियां
निवेशकों की नजरें अब RBI (NBFCs) क्रेडिट फैसिलिटीज़ अमेंडमेंट डायरेक्शन 2026 के ड्राफ्ट पर हैं। अगर ये नियम लागू होते हैं, तो शैडो बैंकों (NBFCs) द्वारा रिवॉल्विंग क्रेडिट देने के तरीके बदल सकते हैं, जिससे लिक्विडिटी पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, वेस्ट एशिया में जारी जियोपॉलिटिकल तनाव का असर एक्सपोर्ट करने वाली मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स पर पड़ सकता है। राजस्थान जैसे राज्यों ने ₹3.4 लाख करोड़ के पोर्टफोलियो के साथ मजबूती दिखाई है, लेकिन वैश्विक आर्थिक दबाव अभी भी सेक्टर के लिए एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
