देश के ग्रामीण इलाकों में बैंकिंग सेवाएं देने वाले एजेंट्स की संख्या में बड़ी गिरावट आई है। वित्त वर्ष 2024 में जहां ये संख्या **15.48 लाख** थी, वहीं वित्त वर्ष 2025 में घटकर **13.11 लाख** रह गई है। एजेंट्स की कमी को देखते हुए RBI अब एक नया और स्टैंडर्डाइज्ड पेमेंट फ्रेमवर्क लाने की तैयारी कर रहा है।
भारत का बिजनेस कॉरेस्पोंडेंट (BC) नेटवर्क, जो ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग का मुख्य जरिया है, इस समय गंभीर संकट से जूझ रहा है। डेटा के मुताबिक, पिछले एक साल में बैंकिंग आउटलेट्स की संख्या में 15.48 लाख से 13.11 लाख तक की गिरावट आई है। यह ट्रेंड बताता है कि देश की फाइनेंशियल इंक्लूजन (Financial Inclusion) मुहिम पर दबाव बढ़ रहा है।
एजेंट क्यों छोड़ रहे हैं काम?
इस गिरावट की मुख्य वजह एजेंट्स की घटती कमाई है। मौजूदा कमीशन स्ट्रक्चर एजेंट्स के लिए टिकाऊ नहीं रह गया है। बेहतर और निश्चित कमाई के लिए बड़ी संख्या में एजेंट्स अब 'गिग इकोनॉमी' की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे दूरदराज के इलाकों में बैंकिंग सेवाएं ठप हो रही हैं।
RBI का नया फ्रेमवर्क
इन समस्याओं को सुलझाने के लिए RBI ने अप्रैल 2026 में 'ब्रांच ऑथोराइजेशन अमेंडमेंट डायरेक्शन' का ड्राफ्ट पेश किया है। इसमें दो-स्तरीय सिस्टम का प्रस्ताव है:
- बिजनेस कॉरेस्पोंडेंट-बैंकिंग आउटलेट्स: फिक्स्ड वर्किंग ऑवर्स वाले स्थिर यूनिट्स।
- बिजनेस कॉरेस्पोंडेंट-बैंकिंग टचपॉइंट्स: लचीली सेवाओं वाले पॉइंट्स।
नियामक का लक्ष्य एक ऐसा पेमेंट मॉडल तैयार करना है जिसमें फिक्स्ड और वेरिएबल पे का मिश्रण हो, ताकि एजेंट्स का पलायन रोका जा सके।
बैंकों पर वित्तीय असर
जो बैंक अपने ग्रामीण नेटवर्क के लिए पूरी तरह BC मॉडल पर निर्भर हैं, उनके लिए यह बदलाव चुनौतीपूर्ण हो सकता है। यदि बैंकों को एजेंट्स को ज्यादा कमीशन देना पड़ा, तो उनका ऑपरेटिंग खर्च बढ़ना तय है। निवेशकों को उन बैंकों पर नजर रखनी चाहिए जिनका ग्रामीण फुटप्रिंट बड़ा है, क्योंकि उन्हें इस नए रेगुलेटरी बदलाव के हिसाब से अपने कॉस्ट स्ट्रक्चर में बदलाव करना होगा।
