भारत में रिटेल क्रेडिट का बदलता चेहरा: गोल्ड और ड्यूरेबल्स की बढ़ी मांग

BANKINGFINANCE
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AuthorAditi Chauhan|Published at:
भारत में रिटेल क्रेडिट का बदलता चेहरा: गोल्ड और ड्यूरेबल्स की बढ़ी मांग
Overview

भारत का रिटेल क्रेडिट बाजार एक बड़े बदलाव से गुजर रहा है। बैंक अब नए कर्जदारों के लिए नियम कड़े कर रहे हैं, जिसके चलते कंज्यूमर ड्यूरेबल्स और गोल्ड-लोन में भारी उछाल देखा जा रहा है। खास बात यह है कि डिफॉल्ट रेट (Default Rate) एक दशक के निचले स्तर पर हैं।

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रिटेल लेंडिंग में आया बड़ा बदलाव

भारतीय क्रेडिट सिस्टम में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। बैंक अब नए कर्जदारों के लिए पारंपरिक एग्रीकल्चर (Agriculture) और टू-व्हीलर फाइनेंसिंग से हटकर, स्थापित पेमेंट हिस्ट्री (Payment History) को ज्यादा महत्व दे रहे हैं। ऐसे में, नए क्रेडिट लेने वालों को छोटे, कंजम्पशन-बेस्ड (Consumption-based) फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स की ओर धकेला जा रहा है।

यही वजह है कि मोबाइल फोन फाइनेंसिंग और अन्य कंज्यूमर ड्यूरेबल्स (Consumer Durables) अब फॉर्मल बैंकिंग सिस्टम में एंट्री का सबसे बड़ा जरिया बन गए हैं। छोटे टिकट साइज (Low-ticket size) वाले प्रोडक्ट्स पर फोकस करके, नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFCs) उन मार्केट शेयर पर कब्जा कर रही हैं, जिसे पारंपरिक ग्रामीण या वाहन-केंद्रित लेंडर्स (Vehicle-focused Lenders) ने छोड़ दिया है।

गोल्ड लोन का बोलबाला

गोल्ड (Gold) अब रिटेल क्रेडिट कैटेगरी में दूसरे नंबर पर आ गया है। इसका साइज लगभग ₹20 ट्रिलियन तक पहुंच गया है, जो कि इसके भौगोलिक विस्तार और दायरे में एक बड़ी बढ़ोतरी दिखाता है। पहले जहां सिर्फ दक्षिणी भारत में इसका ज्यादा चलन था, वहीं अब यह हर जगह फैल चुका है। युवाओं और महिलाओं में भी इसकी पैठ बढ़ी है।

यह दिखाता है कि गोल्ड अब सिर्फ इमरजेंसी फंड नहीं, बल्कि लिक्विडिटी मैनेजमेंट (Liquidity Management) का पसंदीदा जरिया बन गया है। हालांकि, इस विस्तार के साथ ही सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव का जोखिम भी बढ़ा है, जो सीधे तौर पर लोन-टू-वैल्यू (LTV) बफर को प्रभावित करता है।

छिपी हुई कमजोरियां

भले ही डिफॉल्ट रेट (Delinquency Figures) एक दशक के निचले स्तर पर दिख रहे हों, लेकिन यह ऊपरी आंकड़ा असलियत को छिपा रहा है। छोटे टिकट साइज वाले कई लोन लेने वाले व्यक्तियों के लिए यह एक बड़ा जोखिम बन सकता है। अगर इकोनॉमिक कंडीशंस (Macro Conditions) टाइट हुईं, तो ये मल्टी-लोन (Multiple-loan) वाले डिफॉल्ट कर सकते हैं, जिन्हें वर्तमान क्रेडिट रिपोर्टिंग सिस्टम शायद कंट्रोल न कर पाए।

इसके अलावा, कमर्शियल व्हीकल (Commercial Vehicle) फाइनेंसिंग एक लगातार कमजोर कड़ी बनी हुई है। यह सेगमेंट बहुत ज्यादा लीवरेज्ड (Leveraged) है और फ्यूल कॉस्ट (Fuel Costs) व सप्लाई चेन (Supply Chain) की दिक्कतों के प्रति संवेदनशील है। ऐसे में, महंगाई बढ़ने पर इस सेक्टर में भारी निवेश करने वाले लेंडर्स को भारी नुकसान हो सकता है।

रेगुलेटरी बदलाव और बाजार का भविष्य

RBI (Reserve Bank of India) द्वारा वीकली क्रेडिट रिपोर्टिंग (Weekly Credit Reporting) को बढ़ावा देना, रियल-टाइम ओवरसाइट (Real-time Systemic Oversight) की ओर एक कदम है। डेटा की इस बढ़ी हुई वेलोसिटी (Velocity) से रेगुलेटर्स लेंडर्स को ज्यादा सटीक रिस्क-बेस्ड प्राइसिंग (Risk-based Pricing) की ओर धकेल रहे हैं।

जैसे-जैसे 180 मिलियन भारतीय अपने क्रेडिट स्कोर से जुड़ रहे हैं, बाजार एक ज्यादा अनुशासित, लेकिन प्रतिबंधात्मक माहौल की ओर बढ़ रहा है। फिनटेक (Fintech) कंपनियाँ हाई-मार्जिन पर्सनल लोन की ओर बढ़ रही हैं, जबकि कैपिटल-इंटेंसिव (Capital-intensive) ड्यूरेबल्स सेक्टर में NBFCs का दबदबा कायम है, जिनके पास मजबूत फिजिकल डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क (Physical Distribution Networks) है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.