देश के 28 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRBs) ने फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में शानदार प्रदर्शन करते हुए **₹10,176 करोड़** का रिकॉर्ड नेट प्रॉफिट दर्ज किया है। बैड लोन (NPA) घटकर **5.3%** के निचले स्तर पर आ गए हैं, जो सेक्टर में बड़े बदलाव का संकेत है।
मुनाफे में बड़ा उछाल और कंसोलिडेशन का असर
RRBs के लिए यह साल ऐतिहासिक रहा है। पिछले फाइनेंशियल ईयर में इनका मुनाफा ₹6,820 करोड़ था, जो अब बढ़कर ₹10,176 करोड़ के स्तर पर पहुंच गया है। सरकार की कंसोलिडेशन रणनीति काम कर रही है, जिसके बाद अब कुल 28 बड़े बैंक देश भर में 22,273 शाखाओं के जरिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
लोन बुक की सुधरी सेहत
बैंकों का बिजनेस वॉल्यूम अब ₹13.5 लाख करोड़ के आंकड़े को पार कर गया है। क्रेडिट-डिपॉजिट रेश्यो 75.2% है, जो बताता है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पैसे का प्रवाह बेहतर हुआ है। सबसे अच्छी खबर बैड लोन (Gross NPA) को लेकर है, जो रिकॉर्ड निचले स्तर 5.3% पर आ गया है, जबकि नेट NPA 2.1% है।
चुनौतियां अभी बाकी हैं
भले ही आंकड़े बेहतर दिख रहे हों, लेकिन रिस्क पूरी तरह टला नहीं है। पब्लिक सेक्टर बैंकों (PSBs) की तुलना में RRBs का NPA स्तर अभी भी थोड़ा ज्यादा है। साथ ही, टेक्नोलॉजी और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए ये बैंक पूरी तरह अपने 'स्पॉन्सर बैंकों' पर निर्भर हैं। अगर स्पॉन्सर बैंकों ने समय पर सिस्टम अपग्रेड नहीं किए, तो इनकी ऑपरेशनल एफिशिएंसी पर असर पड़ सकता है।
आगे का रास्ता और निवेशकों के लिए संकेत
इन बैंकों का भविष्य अब रेवेन्यू डायवर्सिफिकेशन पर टिका है। हालांकि ये बैंक प्रधानमंत्री जन धन योजना और प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के लिए बड़े जरिया बने हुए हैं, लेकिन प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना जैसे अन्य प्रोडक्ट्स की क्रॉस-सेलिंग अभी भी चुनौती बनी हुई है। चूंकि ये बैंक शेयर बाजार में लिस्टेड नहीं हैं, इसलिए निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो में शामिल उन स्पॉन्सर बैंकों पर नजर रखनी चाहिए जो इन RRBs को सपोर्ट कर रहे हैं।
