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RBI का बड़ा फैसला: M&A बायआउट लोन का रास्ता खुला, पर इन कंपनियों को झटका!

BANKINGFINANCE
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AuthorNeha Patil|Published at:
RBI का बड़ा फैसला: M&A बायआउट लोन का रास्ता खुला, पर इन कंपनियों को झटका!
Overview

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने कंपनियों के अधिग्रहण (Acquisition) और कंट्रोल (Control) के लिए बैंकों द्वारा लोन दिए जाने के नियमों में बड़ा बदलाव किया है। यह पहली बार है जब कंपनियां ऐसे लोन के लिए भारतीय बैंकों का रुख कर सकेंगी, लेकिन इन नए नियमों में कई महत्वपूर्ण शर्तें और पाबंदियां भी शामिल हैं।

एमएंडए बायआउट लोन के लिए नए नियम

अब तक भारत में कंपनियों को खरीदने के लिए मुख्य रूप से प्रमोटर्स की अपनी पूंजी, विदेशी लोन या फिर जटिल वित्तीय व्यवस्थाओं पर निर्भर रहना पड़ता था। लेकिन फरवरी 2026 से यह तस्वीर बदलने वाली है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक नया ढांचा पेश किया है, जिसके तहत भारतीय बैंक अब कंपनियों के टेकओवर (Takeover) या कंट्रोल हासिल करने वाले सौदों के लिए सीधे लोन दे सकेंगे।

इन नए नियमों के तहत, बैंक किसी कंपनी को शुरू में टेकओवर करने या किसी निवेशक द्वारा 26%, 51%, 75% या 90% जैसे महत्वपूर्ण वोटिंग थ्रेशोल्ड तक पहुंचने के लिए अतिरिक्त शेयर खरीदने हेतु लोन दे सकते हैं। 'कंट्रोल' (Control) को कंपनी अधिनियम 2013 के अनुसार परिभाषित किया गया है, जिसका मतलब है प्रमुख फैसलों को निर्देशित करने या अधिकांश डायरेक्टर्स की नियुक्ति करने की शक्ति। आरबीआई का यह कदम पुराने दिशा-निर्देशों को एक स्पष्ट फ्रेमवर्क में लाकर बाज़ारों को खोलने और मजबूत निगरानी बनाए रखने का लक्ष्य रखता है।

किन कंपनियों को मिली छूट, कौन बाहर?

नई गाइडलाइंस का महत्व तो है, लेकिन कुछ सख्त शर्तों के कारण इनका दायरा सीमित हो गया है। खास तौर पर, विदेशी स्वामित्व और नियंत्रण वाली कंपनियां (FOCCs) विदेशी निवेश नियमों के कारण भारतीय बैंक लोन का आसानी से उपयोग नहीं कर पाएंगी। इसके अलावा, नॉन-बैंकिंग फाइनेंसियल कंपनियों (NBFCs) और अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (AIFs) जैसे रेगुलेटेड वित्तीय फर्मों को भी इसमें शामिल नहीं किया गया है (इन्फ्रास्ट्रक्चर ट्रस्ट को छोड़कर)।

यह बाहर रखा जाना खासकर प्राइवेट इक्विटी (Private Equity) फर्मों के नेतृत्व वाले बायआउट्स को प्रभावित करता है, जो अक्सर जोखिम को सीमित करने के लिए विशेष कंपनियाँ बनाते हैं। खरीदार और विक्रेता के बीच संबंधित पार्टियों से उधार लेने पर भी रोक है, सिवाय कुछ खास शेयर-बिल्डिंग परिस्थितियों के। इसके अलावा, इस बात पर भी अस्पष्टता बनी हुई है कि बैंक कैसे कोलेटरल (Collateral) चुनेंगे, एक्सपोजर लिमिट (Exposure Limit) तय करेंगे, मौजूदा कर्ज को रीफाइनेंस (Refinance) करना क्या माना जाएगा, और यदि सौदा 12 महीने से अधिक समय लेता है तो क्या होगा।

डील करने के तरीके में बदलाव

यह नया सिस्टम डील करने के तरीके को बदलेगा। ड्यू डिलिजेंस (Due Diligence) में सिर्फ खरीदार की तरफ ही नहीं, बल्कि बैंक के क्रेडिट रिस्क (Credit Risk) की भी गहरी जांच शामिल होगी। सौदों की संरचना करते समय सेबी (SEBI) के टेकओवर कोड और शेयर खरीद के लिए फंड मुहैया कराने से संबंधित कंपनी कानूनों पर सावधानी से विचार करना होगा। बैंकों द्वारा वैल्यूएशन (Valuation) का स्वतंत्र मूल्यांकन किया जाएगा, जो बाजार मूल्य से भिन्न हो सकता है और गैप को कवर करने के लिए अतिरिक्त धन की आवश्यकता पड़ सकती है।

सतर्क शुरुआत की उम्मीद

जानकार मानते हैं कि आरबीआई का यह कदम भारत को अंतरराष्ट्रीय एमएंडए (M&A) फाइनेंसिंग मानकों के करीब लाता है और महत्वपूर्ण सौदों के लिए पूंजी तक पहुंच में सुधार करता है। हालाँकि, अधिकांश का मानना ​​है कि इसका प्रारंभिक प्रभाव सतर्क रहेगा। बैंक सावधानी से आगे बढ़ेंगे, और शुरुआती सफल सौदे नियमों की समझ को आकार देने में मदद करेंगे। इन नए नियमों का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि पहले सौदों को कितनी अच्छी तरह संभाला जाता है और नियामकों या बाज़ार द्वारा अस्पष्ट बिंदुओं को कैसे स्पष्ट किया जाता है।

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