भारत का प्राइवेट क्रेडिट सेक्टर एक बड़े 'स्ट्रेस टेस्ट' से गुजरने वाला है। रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स के लोन मैच्योरिटी के करीब हैं और **₹12.74 लाख करोड़** के AIF कमिटमेंट्स के बीच अब यह तय होगा कि कौन से डेवलपर्स टिक पाएंगे और कौन लिक्विडिटी के संकट में फंसेंगे।
भारत का प्राइवेट क्रेडिट मार्केट, जिसने IL&FS और DHFL संकट के बाद रियल एस्टेट सेक्टर को लाइफलाइन दी थी, अब एक चुनौतीपूर्ण दौर में है। पिछले कई सालों तक इंडस्ट्री का पूरा फोकस बैंकों और NBFCs की जगह खाली भर कर कैपिटल बांटने पर था। लेकिन अब कहानी बदल गई है, क्योंकि अब 2026 और 2027 में इन लोन की रीपेमेंट का समय आ गया है।
बड़े आंकड़े और दबाव
मार्च 2026 तक कैटेगरी II ऑल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (AIFs) में कमिटमेंट्स बढ़कर ₹12.74 लाख करोड़ तक पहुंच गए हैं, जिसका एक बड़ा हिस्सा रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स में लगा है। अगर इसमें NBFCs का ₹1 लाख करोड़ से ज्यादा का सीधा एक्सपोजर जोड़ दिया जाए, तो यह कर्ज की एक बहुत बड़ी राशि है जिसे या तो रीपे करना होगा या रोलओवर करना होगा।
दो हिस्सों में बंटेगा बाजार
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अब बाजार में दो तरह के डेवलपर्स साफ दिखेंगे। पहली कैटेगरी उन मजबूत कंपनियों की होगी जिनके पीछे बड़े बैंक और संस्थान हैं, जो आसानी से अपना कर्ज मैनेज कर लेंगे। दूसरी तरफ, वो कंपनियां होंगी जिन्होंने महंगे स्ट्रक्चर्ड क्रेडिट पर भरोसा किया था। इन्हें अब ऊंची ब्याज दरों, अतिरिक्त कोलेटरल (collateral) की मांग और यहां तक कि एसेट्स की बिक्री तक का सामना करना पड़ सकता है।
रेगुलेटरी सख्ती का असर
रेगुलेटरी मोर्चे पर भी चुनौतियां बढ़ी हैं। नवंबर 2023 में Reserve Bank of India ने NBFCs को दिए जाने वाले बैंक लोन पर रिस्क वेट 25 बेसिस पॉइंट्स बढ़ा दिए थे, जिससे सिस्टम में लिक्विडिटी टाइट हो गई है। वहीं, SEBI भी AIFs के एसेट वैल्यूएशन पर बारीकी से नजर रख रही है।
आने वाले 2026-27 के साल यह साबित करेंगे कि डेवलपर्स ने अपना रिस्क कैसे मैनेज किया है। अब सफलता इस बात से नहीं मापी जाएगी कि किसने कितना कैपिटल बांटा, बल्कि इस बात से मापी जाएगी कि मैच्योरिटी के वक्त कौन अपना पैसा सुरक्षित वापस लाने में सफल रहा है।
