साल 2026 की पहली छमाही में भारत के फूड एंड बेवरेज सेक्टर में प्राइवेट क्रेडिट (Private Credit) का जाल बिछ गया है। निवेश में 12 गुना की भारी बढ़त के साथ अब यह सेक्टर कुल बाजार का **12%** हिस्सा संभाल रहा है।
भारत के प्राइवेट क्रेडिट मार्केट में साल 2026 की पहली छमाही के दौरान बड़ा बदलाव देखने को मिला है। फूड और बेवरेज इंडस्ट्री, जो कभी निवेश की दौड़ में पीछे थी, अब टॉप लिस्ट में शामिल हो गई है। आंकड़ों के अनुसार, इस सेक्टर का कुल मार्केट शेयर जो 2025 की दूसरी छमाही में मात्र 1% था, वह अब उछलकर 12% पर पहुंच गया है। अब यह सेक्टर रियल एस्टेट (35%) और हेल्थकेयर (13%) के बाद तीसरा सबसे बड़ा रिसीवर बन गया है।
निवेश का गणित
भारत में इस अवधि के दौरान कुल $3.5 बिलियन का प्राइवेट क्रेडिट निवेश हुआ, जिसमें 100 से ज्यादा डील्स शामिल थीं। गौर करने वाली बात यह है कि इस निवेश में 74% योगदान घरेलू फंड्स का रहा है। लेंडर्स अब औद्योगिक सेक्टर के बजाय उन कंपनियों पर दांव लगा रहे हैं जो सीधे तौर पर कंज्यूमर डिमांड से जुड़ी हैं।
प्रमुख डील्स
- HyFun Foods Group: कंपनी ने रिफाइनेंसिंग और वर्किंग कैपिटल के लिए $156 मिलियन की सुविधा जुटाई है।
- Lenexis Foodworks: कंपनी ने एक्विजिशन फाइनेंसिंग के लिए $113 मिलियन का बड़ा कर्ज लिया है।
निवेशकों के लिए जोखिम (Investor Alert)
प्राइवेट क्रेडिट बैंक लोन की तुलना में अधिक लचीला (Flexible) जरूर होता है, लेकिन इसमें जोखिम भी छिपा है। इन एग्रीमेंट्स में कंपनियों को लगातार मजबूत कैश फ्लो बनाए रखना होता है। यदि कच्चा माल महंगा होता है या कंज्यूमर डिमांड घटती है, तो कंपनियों का प्रॉफिट मार्जिन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। जैसे-जैसे प्राइवेट लेंडर्स के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, शर्तों में सख्ती आ सकती है। निवेशकों को अब यह देखना होगा कि क्या कंपनियां अपने भारी कर्ज को मैनेज कर विकास की रफ्तार बनाए रख पाती हैं या यह डेप्ट मॉडल आगे चलकर वित्तीय दबाव पैदा करेगा।
