यह बड़ा बदलाव भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के उन निर्देशों के अनुरूप है, जो 1 अप्रैल, 2026 से लागू होंगे। इन नियमों के तहत डिजिटल पेमेंट के लिए कम से कम एक 'डायनामिक ऑथेंटिकेशन फैक्टर' (dynamic authentication factor) ज़रूरी होगा। Visa और Mastercard इस कदम से कार्ड फ्रॉड (card fraud) से लड़ने की तैयारी कर रहे हैं, जो पिछले कुछ सालों में चिंता का विषय बना हुआ है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ₹1,447.27 करोड़ से ज़्यादा का फ्रॉड फाइनेंशियल ईयर 2022 से सितंबर 2025 के बीच क्रेडिट कार्ड के ज़रिए हुआ है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये फ्रॉड अक्सर सोशल इंजीनियरिंग (social engineering) के ज़रिए होते हैं, जहां ग्राहकों को OTP बताकर ठगा जाता है।
अच्छी खबर यह है कि यह बदलाव ग्राहकों के लिए पेमेंट को तेज़ और ज़्यादा सुविधाजनक बनाएगा। Mastercard के मुताबिक, जिन ग्राहकों को पासकी इस्तेमाल करने का विकल्प दिया गया, उनमें से 30% ने तुरंत इसे अपना लिया। इससे SMS-आधारित OTP के इंतज़ार और उसकी डिलीवरी में होने वाली देरी खत्म हो जाएगी, जिससे ट्रांजैक्शन (transaction) की सफलता दर में 2 से 3% तक की बढ़ोतरी होने की उम्मीद है।
यह कदम ग्लोबल लेवल पर 'पासवर्डलेस ऑथेंटिकेशन' (passwordless authentication) के बढ़ते ट्रेंड का हिस्सा है। दुनिया भर में करीब 340 मिलियन (यानी 12.4%) डिजिटल बैंकिंग ग्राहक मार्च 2026 तक पासकी या FIDO2 जैसे तरीकों का इस्तेमाल कर रहे होंगे। JPMorgan Chase जैसे बैंक भी 40% से ज़्यादा एडॉप्शन देख रहे हैं। साथ ही, दुनिया भर के करीब 60% स्मार्टफोन में अब बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन की सुविधा मौजूद है। बायोमेट्रिक पेमेंट मार्केट के 2032 तक 34.8 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।
भारत डिजिटल पेमेंट के मामले में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। UPI जैसे प्लेटफॉर्म्स की वजह से, FY25 में 206 बिलियन ट्रांजैक्शन से यह FY30 तक 617 बिलियन तक पहुंच सकते हैं। पूरे डिजिटल पेमेंट मार्केट का आकार 2034 तक 33.5 अरब डॉलर होने की उम्मीद है, जिसमें 16.1% की सालाना वृद्धि दर (CAGR) देखी जा सकती है। RBI के नए दिशानिर्देश इस तेज़ विकास को और गति देंगे।
हालांकि, इस बड़े बदलाव के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। सबसे पहली चुनौती 'डिजिटल डिवाइड' (digital divide) है। हर ग्राहक के पास ऐसे स्मार्टफोन नहीं हैं जिनमें एडवांस्ड बायोमेट्रिक क्षमताएं हों। ऐसे में, कुछ लोग इस नई व्यवस्था से बाहर रह सकते हैं। इसके अलावा, बायोमेट्रिक डेटा की नकल (spoofing) या डिवाइस के हैक होने का खतरा भी बना रहता है। अगर ग्राहक अपना मुख्य डिवाइस खो देता है, तो पासकी का इस्तेमाल करने में दिक्कत आ सकती है। सुरक्षा के नए तरीके आने पर फ्रॉड करने वाले भी अपने तरीके बदल रहे हैं, इसलिए लगातार सतर्क रहने की ज़रूरत है।
फिलहाल, यह एक ट्रांज़िशन पीरियड (transition period) है, जहां ग्राहक चाहें तो OTP का इस्तेमाल जारी रख सकते हैं। लेकिन RBI के नियमों और इंडस्ट्री की तेज़ी को देखते हुए, यह तय है कि आने वाले समय में बायोमेट्रिक और डिवाइस-आधारित ऑथेंटिकेशन ही पेमेंट का मुख्य तरीका बनेगा। यह भारत को डिजिटल पेमेंट इनोवेशन में एक लीडर के तौर पर स्थापित करेगा, जहाँ सिक्योरिटी और सुविधा, दोनों का ध्यान रखा जाएगा।