सरकारी बैंकों की इस शानदार परफॉरमेंस के पीछे 15.7% की रफ्तार से बढ़े एडवांसेज (Advances) और 10.6% की बढ़ोतरी के साथ जमा हुईं डिपॉजिट्स (Deposits) का बड़ा हाथ है। कुल मिलाकर, बैंकों का टोटल बिजनेस 12.8% बढ़कर ₹283.3 लाख करोड़ तक पहुँच गया। यह सब सरकार के सुधारों, बेहतर गवर्नेंस और टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल का नतीजा है।
एसेट क्वालिटी में जबरदस्त सुधार
सिर्फ मुनाफे में ही नहीं, सरकारी बैंकों ने एसेट क्वालिटी (Asset Quality) के मोर्चे पर भी कमाल कर दिखाया है। मार्च 2026 तक ग्रॉस नॉन-परफॉरमिंग एसेट्स (NPAs) रिकॉर्ड 1.93% और नेट NPAs घटकर 0.39% पर आ गए। नए NPA बनने की दर (Fresh Slippages) भी घटकर 0.7% रह गई, जबकि राइट-ऑफ (Written-off) खातों से भी ₹86,971 करोड़ की रिकवरी हुई। सभी सरकारी बैंकों का प्रोविजनिंग कवरेज रेश्यो 90% से ऊपर है, जो भविष्य के किसी भी झटके से निपटने के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच है। याद दिला दें कि FY18 में NPA 14.58% तक पहुँच गया था।
प्राइवेट बैंकों से कड़ी प्रतिस्पर्धा
मगर, इस शानदार कामयाबी के बावजूद सरकारी बैंकों के सामने बड़ी चुनौतियाँ हैं, खासकर प्राइवेट सेक्टर के बैंकों से। HDFC Bank और ICICI Bank जैसे बड़े प्राइवेट बैंक मार्केट कैप (Market Cap) में State Bank of India से भी कहीं आगे निकल चुके हैं। वैल्यूएशन (Valuation) की बात करें तो, Union Bank of India जैसे PSBs का P/E रेश्यो करीब 7.0x और Bank of Maharashtra का 9.2x है, जबकि ICICI Bank का P/E 15.67x पर चल रहा है। यह बताता है कि निवेशक प्राइवेट बैंकों में ज्यादा ग्रोथ पोटेंशियल या अलग रिस्क प्रोफाइल देखते हैं। साथ ही, डिपॉजिट्स के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा बैंकों की फंडिंग कॉस्ट (Funding Cost) बढ़ा सकती है।
इकोनॉमी और भविष्य के जोखिम
अच्छी बात यह है कि इंडिया की इकोनॉमी FY27 में 6.4% की रफ्तार से बढ़ने की उम्मीद है, जो बैंकों के लिए एक पॉजिटिव माहौल है। लेकिन, वेस्ट एशिया में चल रहा तनाव और बढ़ती तेल की कीमतें इकोनॉमी को अनस्टेबल कर सकती हैं और महंगाई बढ़ा सकती हैं। क्रेडिट ग्रोथ (Credit Growth) भी 15.9% (FY26) की रफ्तार से बढ़ी है, जो अनसिक्योर्ड रिटेल और MSME लोन में भविष्य में एसेट क्वालिटी की समस्याएँ खड़ी कर सकती है। आने वाले समय में April 2027 से लागू होने वाले नए Expected Credit Loss (ECL) नियमों से बैंकों की कैपिटल एडिक्वेसी (Capital Adequacy) में 60-70 बेसिस पॉइंट्स की कमी आ सकती है।
एनालिस्ट्स की चिंताएं और आगे का रास्ता
एक्सपर्ट्स का मानना है कि प्राइवेट बैंक अक्सर कम फ्रेश स्लिपेज दिखाते हैं, शायद उनके लोन अप्रूवल प्रोसेस ज़्यादा सख्त हों। भले ही सरकारी बैंकों ने गवर्नेंस और सरकारी सपोर्ट पर निर्भरता जैसी पुरानी समस्याओं को दूर किया हो, पर कम वैल्यूएशन से लगता है कि निवेशक उनकी भविष्य की ग्रोथ धीमी रहने या प्राइवेट बैंकों की तुलना में ज़्यादा रिस्क रहने की उम्मीद करते हैं। SBI की ₹27,42,584 करोड़ जैसी बड़ी कॉन्टिनजेंट लायबिलिटीज़ (Contingent Liabilities) पर भी नजर रखनी होगी। आगे चलकर बैंकिंग सेक्टर में डबल-डिजिट ग्रोथ (Credit Growth) 11-14% रहने का अनुमान है। सरकारी बैंक मार्केट शेयर वापस पा रहे हैं, लेकिन ICICI और HDFC जैसे बड़े प्राइवेट बैंक ग्रोथ में आगे रहेंगे। रेगुलेटरी बदलाव, ECL नॉर्म्स और भू-राजनीतिक जोखिम जैसी चुनौतियाँ बनी रहेंगी, लेकिन मजबूत कैपिटल, बेहतर एसेट क्वालिटी और सपोर्टिव इकोनॉमी की मदद से बैंक इन रिस्क को मैनेज कर सकते हैं।
