FY26 में लाइफ इंश्योरेंस सेक्टर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। पहली बार पॉलिसी सरेंडर और विड्रॉल का आंकड़ा मैच्योरिटी क्लेम से बढ़कर **38.3%** पर पहुंच गया है, जिसे लेकर RBI ने गंभीर चिंता जताई है।
बाजार का बदलता ट्रेंड
भारतीय इंश्योरेंस सेक्टर में एक चौंकाने वाला ट्रेंड सामने आया है। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के आंकड़ों के मुताबिक, पॉलिसी सरेंडर और विड्रॉल के जरिए बाहर जाने वाली राशि, मैच्योरिटी पर मिलने वाले फायदों से ज्यादा हो गई है। कुल बेनिफिट्स में सरेंडर और विड्रॉल का हिस्सा 38.3% रहा, जबकि मैच्योरिटी क्लेम का आंकड़ा 36.9% तक सिमट गया।
क्यों बढ़ रहे हैं सरेंडर?
बीमा कंपनियों का मानना है कि इसे केवल नकारात्मक नजरिए से नहीं देखना चाहिए। खासकर ULIPs जैसे मॉडर्न प्रोडक्ट्स में पॉलिसीहोल्डर्स अक्सर लॉक-इन पीरियड खत्म होने के बाद अपनी जरूरत (जैसे हेल्थ या एजुकेशन) के लिए लिक्विडिटी का इस्तेमाल करते हैं। कंपनियों के मुताबिक, यह ग्राहक की बदलती वित्तीय जरूरतों का हिस्सा है।
RBI की चिंता और जोखिम
हालांकि, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने अपने जून 2026 की रिपोर्ट में इसे लेकर चेतावनी दी है। RBI का मानना है कि यह ट्रेंड 'मिस-सेलिंग' और ग्राहकों की असंतुष्टि की तरफ इशारा करता है।
निवेशकों के लिए यहाँ दो बड़े रिस्क हैं:
- Asset-Liability Management (ALM): जब अचानक बड़ी संख्या में लोग पॉलिसी छोड़ते हैं, तो इंश्योरेंस कंपनियों को अपने लॉन्ग-टर्म निवेश को समय से पहले बेचना पड़ता है, जिससे मुनाफे पर दबाव आता है।
- रेगुलेटरी सख्ती: IRDAI इस पूरे मामले पर बारीकी से नजर बनाए हुए है। भविष्य में कमीशन स्ट्रक्चर में बदलाव और पारदर्शिता को लेकर कड़े नियम आ सकते हैं, जो कंपनियों के मार्जिन को प्रभावित कर सकते हैं।
आगे क्या देखें?
अब निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां ग्राहकों को रोकने के लिए क्या कदम उठाती हैं। कई कंपनियां अब एग्जिट से पहले अनिवार्य कंसल्टेशन प्रोसेस ला रही हैं। कंपनियों की ऑपरेशनल हेल्थ और उनके रेगुलेटरी स्टैंडिंग को समझने के लिए अगले कुछ क्वार्टर काफी महत्वपूर्ण होंगे।
