भारत सरकार की एक बड़ी योजना, जिसमें NaBFID, IIFCL और NIIF जैसी तीन प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग संस्थाओं को मिलाकर एक बड़ा वित्तीय संस्थान बनाने की तैयारी थी, फिलहाल अटक गई है। सरकारी विभागों के बीच प्रशासनिक मतभेदों के चलते इस मर्जर में देरी हो रही है।
इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस सेक्टर में मर्जर पर रोक
भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग सेक्टर को मजबूत करने के लिए सरकार ने NaBFID (नेशनल बैंक फॉर फाइनेंसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट), IIFCL (इंडिया इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनी लिमिटेड) और NIIF (नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट फंड) को मिलाकर एक बड़ी इकाई बनाने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन, यह योजना फिलहाल सरकारी विभागों के बीच चल रही नौकरशाही की खींचतान के कारण रुक गई है।
मर्जर का मकसद और मौजूदा स्थिति
इन तीनों संस्थाओं का लक्ष्य देश के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स जैसे हाईवे, पावर प्लांट और पोर्ट्स के लिए जरूरी पूंजी मुहैया कराना है। मर्जर का मुख्य उद्देश्य इन संस्थाओं के संसाधनों को एक साथ लाना, काम को दोहराने से बचाना और भारत की विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर फंडिंग की जरूरतों को पूरा करने के लिए उधार देने की क्षमता को बढ़ाना था।
मतभेद का कारण
इस मर्जर में मुख्य बाधा वित्तीय कमजोरी नहीं, बल्कि प्रशासनिक प्रतिद्वंद्विता है। NaBFID और IIFCL, वित्तीय सेवा विभाग (Department of Financial Services) के तहत आते हैं, जबकि NIIF आर्थिक मामलों के विभाग (Department of Economic Affairs) के अधीन काम करता है। दोनों विभाग वित्त मंत्रालय का हिस्सा हैं, लेकिन उनकी अलग-अलग रिपोर्टिंग लाइन और प्रशासनिक ढांचे के कारण अधिकारी इस एकीकरण को आगे बढ़ाने में हिचकिचा रहे हैं। यह सवाल कि संयुक्त इकाई का अंतिम नियंत्रण किस विभाग के पास होगा, इस गतिरोध का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है।
वित्तीय स्थिरता पर कोई असर नहीं
मर्जर के अटकने के बावजूद, ये तीनों संस्थाएं वित्तीय रूप से मजबूत बनी हुई हैं। एस&पी ग्लोबल रेटिंग्स (S&P Global Ratings) जैसी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों का कहना है कि NaBFID को सरकार से लगभग निश्चित समर्थन प्राप्त है, ठीक वैसे ही जैसे IIFCL को वर्षों से मिलता रहा है।
तीनों संस्थाएं अच्छी तरह से पूंजीकृत हैं और उनके लोन पोर्टफोलियो में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। 2021 में स्थापित NaBFID ने अपनी शुरुआत के बाद से तेजी से विस्तार किया है। वहीं, NIIF ने अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों से अरबों डॉलर की पूंजी आकर्षित की है। चूंकि ये संस्थाएं स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टेड नहीं हैं, इसलिए इनका फोकस तिमाही नतीजों के बजाय डेट मार्केट और लंबी अवधि के प्रोजेक्ट फाइनेंसिंग पर रहता है।
इंफ्रास्ट्रक्चर डेट मार्केट पर प्रभाव
कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर के निवेशकों के लिए, इस मर्जर के रुकने का मतलब है कि ये तीनों संस्थाएं फिलहाल स्वतंत्र रूप से काम करती रहेंगी। हालांकि, स्वतंत्र रूप से काम करना अपने आप में कोई नकारात्मक बात नहीं है, क्योंकि तीनों के पास फिलहाल उच्च क्रेडिट रेटिंग और मजबूत सरकारी समर्थन है। लेकिन, मर्जर न होने से एक बड़ी, एकीकृत बैलेंस शीट के संभावित लाभ से यह सेक्टर वंचित रह जाएगा।
एक एकल, समेकित संस्थान के पास अंतरराष्ट्रीय और घरेलू बॉन्ड मार्केट में बेहतर उधार दरें प्राप्त करने की अधिक शक्ति हो सकती थी और यह बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपर्स के लिए फंडिंग की प्रक्रिया को सरल बना सकता था।
बाजार के लिए मुख्य बात यह है कि क्या वित्त मंत्रालय इन विभागीय मतभेदों को हल कर पाता है ताकि संचालन क्षमता को बढ़ाया जा सके। निवेशक और बाजार पर्यवेक्षक इन संस्थानों के लिए सरकार की दीर्घकालिक रणनीति को स्पष्ट करने वाले भविष्य के आधिकारिक अपडेट या नीतिगत फैसलों पर नजर रखेंगे।
