दिवालियापन के बाद शानदार वापसी
IIM-A (Indian Institute of Management Ahmedabad) की एक स्टडी बताती है कि IBC के तहत 2025 तक बाहर निकली 1,194 कंपनियों में जबरदस्त सुधार देखा गया है। रिजॉल्यूशन (Resolution) के पाँच सालों के अंदर, इन कंपनियों की एवरेज सेल्स (Sales) में 89% का भारी उछाल आया। ऑपरेशनल एफिशिएंसी (Operational Efficiency) यानी एसेट टर्नओवर (Asset Turnover) में करीब 131% का इजाफा हुआ। कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) 106% तक बढ़ गया, एसेट बेस (Asset Base) 11.5% बढ़ा और लिक्विडिटी (Liquidity) लगभग दोगुनी होकर 106% तक पहुंच गई, जो इनकी शॉर्ट-टर्म फाइनेंशियल हेल्थ (Financial Health) को बेहतर दिखाती है।
निवेशकों का भरोसा बढ़ा
लिस्टेड कंपनियों के लिए तो यह किसी लॉटरी से कम नहीं रहा। रिजॉल्यूशन के पाँच सालों में इन कंपनियों का कंबाइंड मार्केट कैपिटलाइज़ेशन (Market Capitalization) ₹2.8 लाख करोड़ से बढ़कर ₹9 लाख करोड़ हो गया, यानी तिगुना से भी ज़्यादा। यह ग्रोथ तब हुई जब 2024 में भारत का कुल स्टॉक मार्केट वैल्यू लगभग 5.13 ट्रिलियन डॉलर पर पहुंच गया। यह बढ़ा हुआ वैल्यूएशन (Valuation) सफल टर्नअराउंड (Turnaround) के बाद निवेशकों का फिर से भरोसा दिखाने का संकेत देता है, जो भारत की इकोनॉमी (Economy) में कंज्यूमर स्पेंडिंग (Consumer Spending) और इन्वेस्टमेंट (Investment) से संचालित हो रही है।
रिकवरी रेट्स (Recovery Rates) को समझना ज़रूरी
हालांकि, गहराई से देखने पर कुछ महत्वपूर्ण बातें सामने आती हैं। एसेट टर्नओवर में 131% की बड़ी बढ़ोतरी का मतलब यह है कि कंपनियाँ अपने एसेट्स का ज़्यादा कुशलता से इस्तेमाल कर रही हैं, न कि अपने प्रतिस्पर्धियों से बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। Insolvency and Bankruptcy Board of India (IBBI) के अनुसार, Creditors को रिजॉल्व्ड बिजनेस की फेयर वैल्यू का 94% मिला, लेकिन उनके कुल एडमिटेड क्लेम्स (Admitted Claims) का केवल 67% ही मिला। इसका मतलब है कि Creditors को अभी भी काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है, भले ही यह पूरी तरह लिक्विडेशन (Liquidation) से बेहतर है। कई कंपनियाँ ऑपरेशनल ब्रेक-ईवन (Operational Break-even) पर पहुँचीं, मार्जिन निगेटिव से सुधरकर 8% हो गया। यह एक अहम कदम है, जो उन्हें सस्टेनेबल लेवल पर ले जाता है, पर ज़रूरी नहीं कि वे हेल्दी कंपटीटर्स से आगे निकल जाएं।
अभी भी कई चुनौतियाँ बाकी
इन सबগুলোর बावजूद, IBC के तहत कंपनियों की लॉन्ग-टर्म सफलता पर कुछ लगातार बनी हुई समस्याएँ सवाल खड़े करती हैं। कोर्ट के डिले (Delays) और ट्रिब्यूनल्स (Tribunals) पर काम का बोझ होने के कारण रिजॉल्यूशन प्रोसेस (Resolution Process) लंबा खिंच जाता है, जिससे एसेट वैल्यूज़ (Asset Values) को नुकसान पहुँचता है। S&P Global Ratings ने भले ही भारत की इनसॉल्वेंसी रेटिंग को ग्रुप B तक सुधारा है, लेकिन उन्होंने यह भी बताया है कि रिकवरी रेट्स (Recovery Rates) दूसरे बड़े देशों की तुलना में कम हैं और कानूनी मुद्दे अनिश्चितता पैदा करते हैं। लगभग 43% इनसॉल्वेंसी केस आज भी लिक्विडेशन (Liquidation) में खत्म होते हैं। जबकि नए निवेश बढ़ रहे हैं, उनका भविष्य आर्थिक स्थिरता और डिमांड (Demand) पर निर्भर करता है, जो ग्लोबल ट्रेड इश्यूज (Global Trade Issues) और लोकल खर्चों से प्रभावित हो सकती है। ब्रेक-ईवन पर पहुँचना दिखाता है कि कंपनियाँ फिर से काम कर रही हैं, पर ज़रूरी नहीं कि वे तुरंत तेज़ी से ग्रोथ के लिए तैयार हों।
IBC का भविष्य क्या?
IBC के ज़रिए रिजॉल्व हुई कंपनियों का भविष्य भारत की ओवरऑल इकोनॉमी (Economy) पर निर्भर करेगा। जहाँ सरकारी खर्च ग्रोथ को बढ़ा रहा है, वहीं प्राइवेट इन्वेस्टमेंट (Private Investment) की रिकवरी महत्वपूर्ण है। एक्सपर्ट्स IBC को क्रेडिट बिहेविअर (Credit Behaviour) सुधारने और एसेट रिकवरी (Asset Recovery) का एक तरीका मानते हैं। हालांकि, वे रेगुलेटरी सुधारों (Regulatory Improvements) और तेज़ डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन (Dispute Resolution) की ज़रूरत पर ज़ोर देते हैं। यह देखना बाकी है कि ये कंपनियाँ पहले पाँच सालों के बाद लॉन्ग-टर्म में कैसा प्रदर्शन करती हैं, जो IBC के असली असर को दिखाएगा।