Household Debt: भारत का कर्ज GDP के **46%** तक पहुंचा, क्या कंजम्पशन स्टोरी खतरे में है?

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Household Debt: भारत का कर्ज GDP के **46%** तक पहुंचा, क्या कंजम्पशन स्टोरी खतरे में है?

भारत में हाउसहोल्ड डेट (Household Debt) बढ़कर GDP का **46%** हो गया है, जहां लोगों की कमाई से ज्यादा रफ्तार से उधार बढ़ रहा है। **5.5%** की ब्याज दरों के बीच अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या कंजम्पशन-आधारित विकास मॉडल लंबे समय तक टिक पाएगा?

भारतीय अर्थव्यवस्था में ग्रोथ के लिए हाउसहोल्ड बॉरोइंग पर निर्भरता अब एक बड़े टेस्ट से गुजर रही है। आंकड़े बताते हैं कि कर्ज का स्तर GDP के 46% को छू गया है, क्योंकि लोग अपनी डिस्पोजेबल इनकम (Disposable Income) से कहीं ज्यादा रफ्तार में लोन ले रहे हैं। निवेशकों के लिए यह एक संकेत है कि जो कंजम्पशन बूम बाजार की तेजी का आधार बना था, अब वह वास्तविक कमाई के बजाय क्रेडिट पर टिक गया है।

ब्याज दरों का दबाव

अक्टूबर 2026 तक Reserve Bank of India (RBI) ने रेपो रेट को 5.50% पर स्थिर रखा है, जिससे लोन की लागत बढ़ गई है। फ्लोटिंग-रेट वाले लोन महंगे होने से आम आदमी के बजट पर मार पड़ी है। लोग अपनी कमाई का करीब 13% हिस्सा केवल कर्ज चुकाने में खर्च कर रहे हैं, जो पिछले एक दशक का उच्चतम स्तर है। इससे गैर-जरूरी सामानों पर खर्च कम हो सकता है, जिसका सीधा असर कंज्यूमर-फेसिंग कंपनियों के रेवेन्यू पर दिखेगा।

अनसिक्योर्ड क्रेडिट की बढ़ती चिंता

फाइनेंशियल एनालिस्ट्स इस बात से चिंतित हैं कि लोग अब होम लोन जैसे एसेट-बैक्ड लोन के बजाय पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड और गोल्ड लोन जैसे अनसिक्योर्ड लोन की तरफ भाग रहे हैं। हालांकि बैंकों का ग्रॉस बैड लोन रेशियो (Bad Loan Ratio) 1.8% के करीब है, लेकिन डर है कि यह आंकड़ा पूरी सच्चाई नहीं दिखा रहा। कई कर्जदार पुराने लोन चुकाने के लिए नए लोन ले रहे हैं, जिससे डिफॉल्ट का रिस्क छिपा हुआ है।

बैंकों और NBFC के लिए चुनौती

हाल के वर्षों में बैंकों और NBFCs ने अपना रिटेल पोर्टफोलियो काफी तेजी से बढ़ाया है। यदि इनकम ग्रोथ सुस्त रही, तो अनसिक्योर्ड रिटेल लोन सेगमेंट में डिफॉल्ट बढ़ने का खतरा है। विशेष रूप से वे वित्तीय संस्थान जो छोटे-टिकट वाले अनसिक्योर्ड लोन में ज्यादा एक्सपोज्ड हैं, उन्हें आर्थिक सुस्ती के समय अधिक झटका लग सकता है।

निवेशकों की नजर कहां है?

अब बाजार की निगाहें बैंकों के आगामी परफॉर्मेंस अपडेट पर टिकी हैं। निवेशक मुख्य रूप से नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM), लोन लॉस प्रोविजनिंग (Loan Loss Provisioning) और पर्सनल लोन पोर्टफोलियो की ग्रोथ पर नजर रख रहे हैं। यह देखना अहम होगा कि रिटेल लेंडर्स का मैनेजमेंट आने वाली तिमाहियों में एसेट क्वालिटी को कैसे मैनेज करता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.