यह जनसांख्यिकीय बदलाव (demographic shift) हाउसिंग सेक्टर में लोगों की पहुँच बढ़ा रहा है। युवा खरीदारों की पसंद अब साफ दिख रही है - 90-95% तक घर खरीदार Millennials और Gen Z हैं, जिनकी औसत उम्र घटकर सिर्फ 25 साल रह गई है।
खास बात यह है कि 72% तक 40 साल से कम उम्र के लोग स्पीड, सुविधा और ट्रांसपेरेंसी के लिए ऑनलाइन यानी डिजिटल तरीके से ही होम लोन अप्लाई कर रहे हैं। DigiLocker का इस्तेमाल करने वाले होम लोन यूजर्स में भी लगभग 80% 35 साल से कम उम्र के हैं। मजेदार बात यह है कि 60 साल से ज्यादा उम्र के लगभग 47% लोग भी अब डिजिटल प्रोसेस अपना रहे हैं।
हालांकि, डिजिटल होने के बावजूद परेशानियां कम नहीं हुई हैं। 44% लोग डॉक्यूमेंटेशन में अत्यधिक कागजी कार्रवाई को एक बड़ी रुकावट बताते हैं, जबकि 32% लोग एजेंटों द्वारा गलत जानकारी (mis-selling) दिए जाने की शिकायत करते हैं। वहीं 17% लोग अप्रूवल में देरी से परेशान हैं।
इंडियन होम लोन मार्केट का साइज 2024 में करीब $329.9 बिलियन है और यह तेजी से बढ़ रहा है। अनुमान है कि 2033 तक यह $773.8 बिलियन तक पहुंच सकता है, यानी हर साल लगभग 9% की ग्रोथ। कुछ अनुमानों के मुताबिक, 2030 तक यह $900 बिलियन को भी पार कर सकता है।
इस ग्रोथ के पीछे शहरों का बढ़ता विस्तार, मिडिल क्लास का बढ़ना और सरकार की हाउसिंग स्कीम्स जैसे PM Awas Yojana (PMAY) का बड़ा हाथ है।
कंपटीशन की बात करें तो पब्लिक सेक्टर बैंक (PSBs) अभी भी हावी हैं, जिनका मार्केट शेयर 44% से ज्यादा है और कुछ रिपोर्ट के अनुसार यह 50% तक भी पहुंच गया है। ये बैंक अपने भरोसे और कम ब्याज दरों का फायदा उठा रहे हैं। वहीं, प्राइवेट बैंक प्रीमियम सेगमेंट पर फोकस कर रहे हैं, जबकि नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां (NBFCs) और हाउसिंग फाइनेंस कंपनियां (HFCs) खास जगहों (niche segments) पर जैसे कि 40 साल से ऊपर के खरीदारों के लिए, कम शर्तों और जल्दी लोन बांटकर अपनी जगह बना रही हैं। ये छोटे शहरों में भी अपनी सेवाएं दे रही हैं।
बाजार में इतनी तेजी और डिजिटल होने के बावजूद, कुछ बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं, खासकर अफोर्डेबल हाउसिंग (affordable housing) सेगमेंट में, जो युवाओं के लिए बहुत अहम है।
होम फाइनेंस में नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPAs) एक बढ़ती चिंता का विषय रहे हैं, जो 2023 में बढ़कर 4.3% हो गए थे। हाल के आंकड़ों (Q2 FY26) के अनुसार, अफोर्डेबल हाउसिंग फाइनेंस सेक्टर में शुरुआती ड्यूज़ (early-bucket delinquencies) बढ़ रहे हैं और क्रेडिट कॉस्ट (credit costs) भी बढ़ी हुई है। यह दिखाता है कि कम आय वाले कर्जदारों की पेमेंट क्षमता कमजोर हो रही है, जिसका असर छोटे शहरों के मार्केट पर भी पड़ रहा है।
डिजिटल सुविधा के बावजूद, लोगों का भरोसा अभी पूरी तरह से नहीं बना है। इसके लिए ऑनलाइन के साथ-साथ ऑफलाइन सपोर्ट ('phygital' approach) की भी जरूरत है। जिन लोगों की आय अनौपचारिक (informal sectors) या वेरिएबल है, उनके लिए लोन अप्रूवल मुश्किल हो जाता है। HFCs के लिए फंड की ज्यादा लागत और एसेट-लायबिलिटी मिसमैच (asset-liability mismatch) जैसी परेशानियां भी ऑपरेशनल दिक्कतें पैदा कर रही हैं।
आगे चलकर भारतीय हाउसिंग फाइनेंस मार्केट में अच्छी ग्रोथ जारी रहने का अनुमान है। एनालिस्ट्स (analysts) अगले एक दशक में बड़े विस्तार की उम्मीद कर रहे हैं। टेक्नोलॉजी, जैसे AI-आधारित क्रेडिट असेसमेंट (credit assessment) और पर्सनलाइज्ड लोन प्रोडक्ट्स (customized loan products) के इस्तेमाल से और सुविधा बढ़ेगी।
माना जा रहा है कि PSB वॉल्यूम में अपनी लीड बनाए रखेंगे, जबकि प्राइवेट बैंक खास सेगमेंट पर फोकस करेंगे। लेकिन, सस्टेनेबल और इंक्लूसिव ग्रोथ (sustainable and inclusive growth) के लिए इस सेक्टर को बढ़ते NPA और अफोर्डेबल हाउसिंग की दिक्कतों से निपटना होगा। डिजिटल इनोवेशन को अलग-अलग तरह के कर्जदारों की असलियतों से जोड़ पाना ही भविष्य में इस मार्केट को सही दिशा देगा।